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बुधवार, 29 जनवरी 2014

सिद्धा श्रमणी शबरी

सिद्धा श्रमणी शबरी

शबरी भारतवर्ष की इतिहास - चक्र का एक ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव हैं कि उनके बिना रामकथा के पूरी होने की कोई संभावना कदापि नहीं दिख्लाई देती । उस पर तुर्रा यह कि अगर रामकथा का विकास बहुत थोड़ा ही हुआ है तो शबरी के चरित्र में भक्ति का जितना अंश वाल्मीकि रामायण में है, उसका तो भरपूर विकास हुआ है।

शबरी के सन्दर्भ में यह बात प्रसिद्ध है कि उन्होंने राम को बेर खिलाए थे और पक्का करने के लिए कि बेर मीठे हैं, शबरी उन्हें खुद चखकर, पक्का करके कि फलां बेर मीठा है, फिर राम को खाने के लिए दे रही थीं और राम बड़े मजे में उनके जूठे बेर खाते जा रहे थे। फिर यह भी जोड़ दिया गया था कि बेरों को जूठा देखकर लक्ष्मण ने खाने से परहेज किया और आंख बचाकर उन्होंने बेर एक ओर फेंक दिए। फिर यह जुड़ा कि जो बेर लक्ष्मण ने फेंक दिए वे ही बाद में वह जड़ी-बूटी बन गए, जिसे सुंघाकर वैद्यराज सुषेण ने लक्ष्मण को मेघनाद की शक्ति से उत्पन्न मूर्छा से बचाया था। पर यह तमाम बेर प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है और जाहिर है कि शबरी के महत्व को बढ़ाने के लिए ये कथाएं-उपकथाएं जोड़ दी गई हैं।

बाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता अपहरण के बाद जब राम उन्हें ढूंढ़ते हुए भयंकर दण्डकारण्य में मारे-मारे फिर रहे थे, तो पहले उन्हें मरणासन्न जटायु मिले। रावण द्वारा सीता अपहरण की सूचना देकर जटायु ने देह त्याग दी तो राम लक्ष्मण ने उनका दाह-संस्कार किया।

फिर दोनों भाइयों का सामना कबन्ध नामक राक्षस से हुआ, जो सिर्फ धड़ ही था और जिसका मुंह उसके पेट में था। उसे मारा तो मरते ही वह दिव्य पुरुष हो गया और उसने राम लक्ष्मण को बताया कि पश्चिमी कोने (नैट्टत्य) में मतंग मुनि का आश्रम है, जहां लोग तो अब नहीं रहते, पर उनकी परिचारिका श्रमणी शबरी वहां रहती है और आपके दर्शन की उसे लालसा है।

अरण्यकांड के सर्ग 74 में शबरी प्रसंग है। मतंग मुनि का आश्रम दण्डकारण्य में पम्पा सरोवर के किनारे था और हमें मालूम रहना जरूरी है कि संस्कृत साहित्य में पम्पा सरोवर खास आकर्षण का केंद्र रहा है, जिसके आसपास अनेक ऋषि मुनियों ने अपने-अपने तरह-तरह के आश्रम बना रखे थे, जिनका रंग-बिरंगा वर्णन कालिदास के ‘रघुवंश’ महाकाव्य के तेरहवें सर्ग में मिल जाता है। उसी सरोवर के किनारे बने मतंग आश्रम में शबरी रहा करती थीं। वाल्मीकि ने शबरी के लिए दो विशेषणों का खूब प्रयोग किया है-सिद्धा और श्रमणी।

सर्ग 73 के श्लोक 26 में दिव्य शरीरधारी कबन्ध ने शबरी को श्रमणी कहा है- श्रमणी शबरी नाम (अरण्यकांड, 73.26)। वाल्मीकि ने उन्हें 74.7 में एकबार फिर श्रमणी कहा है-तामुवाच ततो राम: श्रमणीं धार्मसंस्थिताम्। उसी अरण्यकांड ने श्लोक 74.6 और 74.10 में कवि ने शबरी को सिद्धा कहा है। अर्थात् आध्यात्मिक उपलब्धियों के क्रम में शबरी ने कुछ मुकाम पार कर लिए थे। पर जिस तल्लीनता से वे पिछले साढ़े तेरह वर्षों से राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं, यह उनके शक्तिमती, प्रपत्तिमति होने का संकेत है और इस तरह शबरी हमारी भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक बनकर हमारे सामने उभर आती है।

 सिद्धा श्रमणी शबरी के आश्रम में आते ही राम ने दो श्लोकों में जो उनसे पूछा वह पढ़ने लायक है-कच्चित्तो निर्जिता: विघ्ना: कच्चित्तो वर्धाते तप:। कच्चिते नियत: कोप आहारश्य तपोधने। कच्चित्तो नियमा: प्राप्ता कच्चित्तो मनस: सुखम् कच्चित्तो गुरुशुश्रुषा सफला चारुभाषिणी। (74.8-9) अर्थात् हे तपोधने, तुम्हारे सारे विघ्न खत्म हो गए हैं? तुम्हारा तप ठीक चल रहा है? क्या तुमने क्रोध और आहार पर विजय पा ली है? क्या नियमों का पालन ठीक तरह से हो रहा है? क्या मन को सुख मिला हुआ है? क्या गुरु की सेवा सफलतापूर्वक हो रही है?

जवाब में शबरी ने कहा है ‘हे राम, जब आप (साढे तेरह वर्ष पूर्व) चित्रकूट आए थे, तभी मुझे गुरुओं ने कहा था कि आप इस आश्रम में पधारेंगे। मैं आपकी प्रतीक्षा कर रही हूं और मैंने आपके लिए फल-मूल इकट्ठे कर रखे हैं।’ शायद बेरों वाला प्रसंग इसी आधार पर बाद में विकसित हुआ। इसके बाद उन सिद्धा शबरी ने राम लक्ष्मण को वह सुन्दर मतंग आश्रम दिखाया और फिर प्रसन्नचित्त वे राम के सामने ही अग्नि प्रज्वलित कर उसमें प्रवेश कर गईं।

अब बताइए इस पूरी कहानी में क्या खास बात है? रामायण, महाभारत और पुराणों में ऐसे सैकड़ों प्रसंग मिल जाएंगे, जहां भक्तजन अपने प्रभु के किसी रूप के आगे लोटपोट होते और प्राणत्याग करते रहे हों। पर ऊपर से सामान्य नजर आने वाले इस प्रसंग का भारत की सभ्यता के विकास में एक खास महत्व है और इसे हम कवष ऐलूष और शम्बूक ऋषि के चरित्र के साथ जोड़कर देखना चाहते हैं।

ऐसा लगता है कि भारत की सभ्यता के विकास के क्रम में राम के आसपास का समय काफी महत्वपूर्ण है। अब तक देश में मुख्यधारा सिर्फ एक ही बह रही थी, यज्ञ की धारा। वही विद्वान ऋषिपद को पा सकता था जो मंत्र रचना करे और उसके मंत्रों का यज्ञों में बकायदा प्रयोग, जिसे यज्ञ की तकनीकी भाषा में विनियोग कहते हैं, हो सके। बेशक एक धारा दूसरी भी चल रही थी, आध्यात्म धारा जिसे प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने प्रवर्तित किया, उनके पुत्र जड़ भरत ने आगे बढ़ाया।

दीर्घतमा मामतेय जैसे कुछ महाकवियों के ‘अस्य वामीय’ सरीखे कुछ सूक्तों में उसका विकास भी हो रहा था, पर जिसका वास्तविक विकास, वेदों के सन्दर्भ में, पांच हजार साल पहले हुए कृष्ण के समय के आसपास हुआ, जब पुरुषसूक्त, कालसूक्त, हिरण्यगर्भसूक्त, सृष्टिसूक्त जैसे विशिष्ट दार्शनिक सूक्तों की रचना हुई। पर छह हजार साल पहले हुए राम के समय तक भारत में यज्ञ की मुख्यधारा और आध्यात्म की उपधारा के साथ-साथ तप और भक्ति की एक नई धारा का प्रवर्तन भी हो चुका था। सरस्वती नदी के किनारे कवष ऐलूष ने जिस हठयोग से ब्राह्मणों को विवश किया, वह हम देख चुके। दण्डकारण्य में शम्बूक ऋषि ने शरीर को कठोर तप का माध्यम बनाकर पूरी व्यवस्था की नींद हराम कर दी, यह भी हम देख चुके।

इधर, वाल्मीकि शबरी को सिद्धा, श्रमणी कह रहे हैं और राम उनसे पूछ रहे हैं कि उनके नियम कैसे चल रहे हैं, तप कैसा चल रहा है। दण्डकारण्य में राम ऐसे अनेक मुनियों से मिले जो तपस्या करने की कई तरह की नई विधियों को ईजाद कर अपने हिसाब से कई तरह से तपश्चर्या में लीन थे। यह सब देखकर लगता है कि यज्ञ के साथ, और मन्द स्वर में सुनाई दे रही आध्यात्म वाणी के साथ, तपस्या और भक्ति को अलग-अलग धाराएं मान सकते हैं, पर दोनों को एक हो जाने में कोई लम्बा रास्ता नहीं तय करना पड़ता। फिर भी अगर दोनों को अलग मानना हो तो आप शम्बूक को तपस्या का और शबरी को भक्ति का मूर्तिमान रूप मानकर नए प्रर्वतकों में शामिल कर सकते हैं।

शबरी ने जिस भक्ति का प्रदर्शन किया है, उसका एक रूप किष्किन्धा काण्ड में हनुमान विकसित कर रहे थे, जिसमें दास्य और ज्ञान का अद्भुत समावेश था तो दूसरी ओर लंका में विभीषण उसे नामजप द्वारा एक आयाम दे रहे थे। शबरी की भक्तिधारा में प्रपत्ति यानी शरणागति शिखर पर है, जो इस महानारी द्वारा राम की इतनी लम्बी प्रतीक्षा में व्यक्त होती है। मतंगमुनि अपना आश्रम छोड़कर चले गए, शेष सारे मुनि भी आश्रम छोड़ गए, पर चूंकि कह गए कि राम एक दिन इधर आएंगे। सो श्रमणी शबरी ने राम की प्रतीक्षा करनी शुरू कर दी। प्रतीक्षा में वे तंग आकर कभी भी वैसे ही अग्नि में प्रवेश कर सकती थीं जैसा उन्होंने राम के सामने किया। पर शबरी ने उस प्रतीक्षा को अपना लिया जिसके आखिरी छोर का उन्हें स्वयं भी पता नहीं था। मतंग आश्रम अपने सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध था और राम भी उस आश्रम का सौन्दर्य देखने उधर आए थे।

राम आएं तो वे आश्रम देखकर निराश न हों, इसलिए सिद्धा श्रमणी शबरी ने आश्रम का सौन्दर्य पूरे परिश्रम से बरकरार रखा और जैसे ही राम वहां आए, उनकी सेवा शुश्रुषा कर उन्हें तुरन्त सारा आश्रम दिखाया, यह बताते हुए कि कौन ऋषि कहां क्या-क्या करते थे। हमारे इतिहास में भक्ति के इस रूप का पहला उदाहरण है श्रमणी शबरी और इसलिए आश्चर्य नहीं कि वे इस देश की सबसे लोकप्रिय प्रेरक कथा रामकथा का अभिन्न अंग हमेशा के लिए बन चुकी हैं।

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

वेदों पश्चात् मनुस्मृति ही सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है।

वेदों के पश्चात् मनुस्मृति ही सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थहै ।

वेदों के पश्चात सर्वमान्य महर्षि मनु द्वारा रचित ग्रन्थ मनुस्मृति की आयु क्या है अर्थात यह लगभग कितना पुराना है ?

स्वयंभू मनु पहले मनुष्य हैं। सारी धरती पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु जी का नाम समाहित है। उनका नाम न आए तो मनुष्य अपनी पहचान भी न जान पाए। अंग्रज़ी में मनुष्य को मैन कहा जाता है। इसमें भी मनु के नाम के 3 अक्षर मौजूद हैं। हिब्रू और अरबी में उन्हें आदम कहा जाता है और उनकी औलाद को बनी आदम कहा जाता है। आदम नाम की धातु ‘आद्य’ संस्कृत में आज भी पाई जाती है। वास्तव में स्वयंभू मनु और आदम एक ही शख्सियत के दो नाम हैं।

संस्कृत में मनुस्मृति के नाम से उनकी शिक्षाओं का एक संकलन भी मिलता है । उनकी शिक्षाओ के रचनाकाल अथवा उनकी शिक्षाओं के संकलन के रचनाकाल पर विचार करना ही इस आलेख का उद्देश्य है ।
स्वामी दयानन्द जी ने वेद की भांति मनुस्मृति को भी सृष्टि के आदि में हुआ माना है। सृष्टि के आदि विषय में स्वामी जी ने मनु को बताया है और मनुस्मृति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष पुराना माना है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में मनुस्मृति के विषय में कहा है -

‘यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है’ (सत्यार्थप्रकाश,एकादशसमुल्लास,पृ.187)

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा है -
‘यह जो वर्त्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें (7) वैवस्त मनु का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव 1, स्वारोचिष 2, औत्तमि 3, तामस 4, रैवत 5, चाक्षुष 6, ये छः तो बीत गए हैं और सातवां वैवस्वत वर्त्त रहा है.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17)


स्वामी जी ने बताया है कि एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगियां होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष, त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मन्वन्तर अर्थात 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लिखे जाते समय तक सातवें मन्वन्तर के भी 120532976 वर्ष बीत चुके थे। इस तरह स्वामी जी के अनुसार उस समय तक स्वयंभू मनु को हुए कुल 1960852976 वर्ष, एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष बीत चुके थे।

स्वामी जी ने यही काल स्वयंभू मनु का बताया है, और उस काल के स्वयंभू मनु को मनु स्मृति का स्मृतिकार बतलाया है । उसमें जो श्लोक मनु के नाम से कहे गए हैं, वास्तव में उन्हें गुरू - शिष्य परम्परा में श्रुति - वाचिक प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी स्मरण कर्तेभुये संरक्षित किया जा रहा था , जिसे बाद में लिपिबद्ध कर लिया गया ।  मनु स्मृति का स्वयंभू मनु से ही संबंध है। हालाँकि स्वामी दयानंद जी ने मनु स्मृति को प्रक्षिप्त मानकर उसके कुछ श्लोकों को नहीं माना है । उन्होंने कहा है कि मनुस्मृति के कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हैं और उनका कुछ पता नहीं है कि उन्हें कब और किसने लिखा है?

अब इस लेख में हम पर्याप्त तर्कों व् प्रमाणों से सिद्ध करेंगे कि मनुस्मृति आज के अंतरजाल के अनुसार भी वेदों  पश्चात् मनुस्मृति ही सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। मनु महाराज की पुस्तक मनुस्मृति महाभारत काल तथा रामायण काल से भी अधिक प्राचीन है अर्थात कम से कम 12220 वर्ष से लाखों वर्ष से पूर्व तक विधमान थी । यहाँ हमने कम से कम 12220 वर्ष  पूर्व लिखा है अतः ये उससे भी अधिक प्राचीन है किन्तु निश्चित समय बता पाना अभी के लिए सम्भव नही ।
महाभारत काल -

सभी को विदित है की महाभारत का समय लगभग 3000  ईसा पूर्व का था अर्थात आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व । यदि प्रमाण चाहे तो यहाँ जाएँ वैज्ञानिक पद्धति दवरा विश्लेषण किया गया है -
https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/xx

महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक -

महर्षि वेदव्यास (कृष्णद्वेपायन ) रचित महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनु में महाभारत वा व्यास जी का नाम तक नही ।

महाभारत में मनु महाराज की प्रतिष्ठा -
मनुनाSभिहितम् शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन ! महाभारत अनुशासन पर्व , अ० ४ ७  - श ० ३ ५
तैरेवमुक्तोंभगवान् मनु: स्वयम्भूवोSब्रवीत् । महाभारत शांतिपर्व , अ० ३ ६   - श ० ५
एष दयविधि : पार्थ ! पूर्वमुक्त : स्वयम्भूवा । महाभारत अनुशासन पर्व , अ० ४ ७  - श ० ५ ८
सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् ।  महाभारत शांतिपर्व , मोक्षधर्म आदि ।

अतः सिद्ध होता है कि मनु महाभारत के समय उपस्थित थी तभी महाभारत रचयिता ने स्वयं राजसी मनु के कथनो को प्रमाण स्वरुप लिखा है ।

अब प्रतिवादी तर्क कर सकता है कि मनु महाभारत में थी ये तो स्पष्ट हो गया परन्तु श्लोकबद्ध मनु उस समय उपलब्ध थी वा नही ? ये स्पष्ट नही हुआ ।

अतः अब ये देखें -

अद्भ्योSग्निब्रार्हत: क्षत्रमश्मनो लोहमुथितं ।
तेषाम सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिशु शाम्यति ।। - मनु अ०  ९ - ३ २ १

ठीक यही मनु का श्लोक महाभारत शांतिपर्व अ० ५ ६    - श २ ४
में आया है और महाभारत के इस श्लोक से ठीक पूर्व २ ३ वें श्लोक में आया है -
"मनुना चैव राजेंद्र ! गीतो श्लोकों महात्मना"
अर्थात हे राजेंद्र ! मनु नाम महात्मा ने इन श्लोकों को कहा है !

इसी प्रकार मनु के जो जो श्लोक ज्यों के त्यों महाभारत में है ;
मैं यहाँ अब केवल उनके श्लोक नम्बर ही लिखा रहा हूँ

मनु ० १ १ /७ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ५
मनु ० १ १ /१२  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ९
मनु ० १ १ /१८ ०   - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ३ ७
मनु ० ६  /४५    - महा० शांति अ ० २४५  - श ० १५
मनु ० २  /१२०     - महा०अनु ० अ ०१०४ - श ० ६४

अब वो श्लोक लिखते है जो मनु के है परन्तु कुछ परिवर्तन के साथ आयें है -

यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: ।
यश्च विप्रोSनधियान  स्त्रयते नाम बिभ्रति । ।  - मनु २ /१५७

यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: ।
ब्राह्मणश्चानधियानस्त्रयते नाम बिभ्रति । ।  -महा  शांति ३६/४७

अब केवल उनके श्लोक नम्बर ही लिखा रहा हूँ जो  कुछ परिवर्तन के साथ आयें है -

मनु ० १ १ /४ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ४
मनु ० १ १ /१२  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ७
मनु ० १ १ /३७  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० २ २
मनु ० ८  /३७२  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ६३
मनु ० २  /२३१  - महा० शांति अ ० १०८ - श ० ७
मनु ० ९  /३  - महा० अनु अ ० ४६ - श ० १४
मनु ० ३ /५५   - महा० अनु अ ० ४६ - श ० ३

लगभग मनु के  ५ ० ऐसे श्लोक है जो ज्यों के त्यों वा कुछ परिवर्तन के साथ महाभारत में आये  है ।

इतने प्रमाणो के रहते कोण कह सकता है कि मनु महाभारत समय में श्लोकबद्ध अवस्था में न थी ?

अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु कम से कम 5000 वर्ष तो पुरानी है ही !!

रामायण काल -
वैसे तो आदि सृष्टि संवत के गणनानुसार श्रीराम का जन्म आज से करीब तेइस लाख वर्ष पूर्व त्रेतायुग में हुआ था। आधुनिक पश्चिमी विद्वानों व इतिहासकारों के मध्य रामायण काल का समय लगभग 7300  ईसा पूर्व का माना जाता है अर्थात आज से लगभग 9300 वर्ष पूर्व । यदि प्रमाण चाहे तो यहाँ जाएँ वैज्ञानिक पद्धति दवरा विश्लेषण किया गया है -
https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/ram
http://www.bookganga.com/eBooks/Books/Details/5484187422894534051


वाल्मीकि रामायण में मनुस्मृति के श्लोक -

महर्षि वाल्मीकि  रचित रामायण में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा आयी है किन्तु मनु में वाल्मीकि , राम जी आदि का नाम तक नही ।

वाल्मीकि रामायण में मनु महाराज की प्रतिष्ठा -

किष्किन्धा काण्ड में जब श्री राम अत्याचारी बाली को घायल कर उसके आक्षेपों के उत्तर में अन्यान्य कथनो के साथ साथ यह भी कहते है कि तूने अपने छोटे भाई सुग्रीव कि स्त्री को बलात हरण कर और उसे अपनी स्त्री बना अनुजभार्याभिमर्श का दोषी बन चूका है , जिसके लिए (धर्मशास्त्र ) में दंड कि आज्ञा है ।
इस पृथिवी के महाराज भरत है (अतः तू भी उनकी प्रजा है ) ; मैं उनकी आज्ञापालन करता हुआ विचरता हूँ फिर में तुझे यथोचित दंड कैसे ना देता ? जैसे -

श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्र वत्सलौ ||
गृहीतौ धर्म कुशलैः तथा तत् चरितम् मयाअ || वाल्मीकि ४-१८-३०

राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || वाल्मीकि ४-१८-३१

शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते |
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् || वाल्मीकि ४-१८-३२

उपरोक्त श्लोक ३० में मनु का नाम आया है और श्लोक ३१ , ३२ भी मनु महाराज के ही है !
उपरोक्त श्लोक किंचित पाठभेद (परन्तु जिससे अर्थ में कुछ भी भेद नही आया ) मनु अध्याय ८ के है ! जिनकी संख्या कुल्लूकभट्ट कि टिकावली में ३१८ व् ३१९ है -

राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || वाल्मीकि ४-१८-३१

राजभिः धूर्त दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || मनु  ८ / ३१८

शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते |
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् || वाल्मीकि ४-१८-३२

शसनाद्वा  अपि मोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद विमुच्यते |
अशासित्वा तू तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ मनु ८/३१६

अतः यह सिद्ध हुआ कि श्लोकबद्ध मनु रामायण के पूर्व भी विधमान थी । यदि कोई कहे ये क्यों न माना
जाये कि उपरोक्त दोनो श्लोक वाल्मीकि से मनु में आयें हो ?
इसका उत्तर यह है कि महर्षि वाल्मीकि  रचित रामायण में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनु में वाल्मीकि , राम जी आदि का नाम तक नही और रामायण में स्पष्टतः मनु के श्लोकों (मनुना गीतौ श्लोकौ) कि प्रशंसा विधमान है ठीक उसी प्रकार जैसे महाभारत में थी "मनुना चैव राजेंद्र ! गीतो श्लोकों महात्मना" - महाभारत शांतिपर्व अ० ५ ६ - श २ ३

अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु कम से कम 9000 वर्ष तो पुरानी है ही !!

किन्तु -
चीन से प्राप्त पुरातात्विक प्रमाण -
विदेशी प्रमाणो मनुस्मृति के काल तथा श्लोको कि संख्या की जानकारी कराने वाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण चीनी मिला है । सन १९३२ में जापान ने बम विस्फोट द्वारा चीन कि ऎतिहासिक दीवार को तोडा तो उसमे से एक लोहे का ट्रंक मिला जिसमे चीनी भाषा कि प्राचीन पांडुलिपियां भरी थी । वे हस्तलेख Sir Augustus Fritz George के हाथ लग गये वो उन्हें लंदन ले गया और ब्रिटिश म्युजियम में रख दिया ।
उन हस्तलेखों को Prof. Anthony Graeme ने चीनी विद्वानो से पढ़वाया तो जानकारी मिली -
चीन के राजा Chin-Ize-Wang ने अपने शासनकाल में यह आज्ञा दी कि सभी प्राचीन पुस्तकों को नष्ट कर दिया जावे जिससे चीनी सभ्यता के सभी प्राचीन प्रमाण नष्ट हो जावे । तब किसी विद्याप्रेमी ने पुस्तकों को ट्रंक में छिपाया और दीवार बनते समय चिनवा दिया । संयोग से ट्रंक विस्फोट से निकल आया ।
चीनी भाषा के उन हस्तलेखों मेसे एक में लिखा है -
'मनु का धर्मशास्त्र भारत में सर्वाधिक मान्य है जो वैदिक संस्कृत में लिखा है और दस हजार वर्ष से अधिक पुराना है'
तथा इसमें मनु के श्लोकों कि संख्या 630 भी बताई गई है किन्तु वर्त्तमान में मनु में 2400 के आस पास श्लोक है ।

The wording is such as to pay high tribute to the genius and influence of the Emperor, but it also proves that many hundreds of years ago this Emperor and his people were possessed of knowledge and ideals, laws, and principles which we are apt to think are quite modern. For instance, The manuscript shows that the Chinese emperor and his people had adopted the Laws of Manu which were written in the Vedic language ten thousand years ago.
- http://rosicrucian.50webs.com/hsl/hsl-light-from-china.htm


यह विवरण मोटवानी कि पुस्तक 'मनु धर्मशास्त्र : ए सोशियोलॉजिकल एंड हिस्टोरिकल स्टडीज' पेज २३२ पर भी दिया है ।

इसके अतिरिक्त R.P. Pathak कि Education in the Emerging India में भी पेज १४८ पर है जो लिंक हम आपको दिए देते है -
ये गूगल पुस्तक है -
http://books.google.co.in/books?id=z_OCjp-T2vIC&pg=PA148&lpg=PA148&dq=Chin-Ize-Wang&source=bl&ots=l2ZvnPXZ9z&sig=F9jLXhHQtOm9-jwGTXjkz9KBzQw&hl=en&sa=X&ei=ZcOGUrPZI46BrgepiIGQCQ&ved=0CDMQ6AEwAQ#v=onepage&q=Chin-Ize-Wang&f=false

इस दीवार के बनने का समय लगभग  220–206 BC बताया जाता है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220BC से पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा  220+10000 = 10220 ईसा पूर्व ; आज से 12,220 वर्ष पूर्व कम से कम तक मनुस्मृति उपलब्ध थी ।

अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु अब से कम से कम 12220 वर्ष पूर्व से और प्राचीन हो चुकी है !

साथ साथ ही यदि वेदों कि बात करें तो

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम ।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम् ॥ मनु १/१३
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारो ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराये उस ब्रह्मा ने अग्नि , वायु, आदित्य और [तु अर्थात ] अंगिरा से ऋग , यजुः , साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया ।

वेदोSखिलो धर्ममूलम् ।  मनु २/६
वेद सम्पूर्ण धर्म (कानून Law) का मूल है ।

यः कश्चित्कस्यचिधर्मो मनुना परिकीर्तित : ।
स सर्वोSभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ मनु २/९
मनु ने जिस किसी को जो कुछ भी धर्म कहा है वह सब वेद के अनुकूल ही है , क्योकि वेद सर्वमान्य है ।

नास्तिको वेदनिंदकः ।  मनु २/११
वेद कि निंदा करने वाले नास्तिक (अनीश्वरवादी) है

इत्यादि अनेक वचन है जो वेद के सन्दर्भ में मनु में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है इसमें लेशमात्र भी संदेह नही ।

मनु में जहाँ कहीं भी वेद विरुद्ध आचरण दिखे वो प्रक्षेप (मिलावट ) है अतः त्याज्य है ।

मनु को जानने के लिए -
 http://www.scribd.com/fullscreen/54496732?access_key=key-1qbdavqxri27m06vvu9a&allow_share=true&view_mode=scroll