बुधवार, 12 मार्च 2014
महाभारत कालीन विमान
मंगलवार, 28 जनवरी 2014
उपनिषद्
रामायण यानी राम का अयन यानी घर अर्थात् रामायण में है राम की कथा। महाभारत उस युद्ध का विराट महाकाव्य है जिससे भारत के सभी राजा महाराजा शामिल हुए तो भारत के एक महायुद्ध के अर्थ में उसका नाम पड़ा महाभारत। ब्राह्मण ग्रन्थ इसलिए वैसे कहलाए क्योंकि उनमें ब्रह्म अर्थात वेद के मंत्रों की व्याख्या यज्ञों के सन्दर्भ में की गई। अरण्य में लिखे जाने के कारण एक खास साहित्य का नाम पड़ गया आरण्यक साहित्य। इसी कड़ी में एक अन्य प्रसिद्ध साहित्य का नाम है उपनिषद । उपनिषद् में तीन शब्द हैं उप, नि और षद। ‘उप’ का अर्थ है नजदीक, आसपास। जैसे राष्ट्रपति उसके एकदम नजदीक उपराष्ट्रपति। ‘नि’ का अर्थ संस्कृत में होता है अच्छी तरह से। ‘षद’ का वास्तविक शब्द है सद जो सन्धि के नियमों के कारण षद हो गया है। अर्थ है बैठना। तो उपनिषद का अर्थ है अच्छी तरह से आसपास बैठना। तो क्या किसी साहित्य का ऐसा नाम भी हो सकता है? हां क्यों नहीं हो सकता? और चूंकि ऐसा है तो इसलिए उसमें भारत की एक खास विचार परम्परा की शक्ल छिपी पड़ी है। कल्पना करिए कि एक आश्रम है। वहां एक पेड़ के नीचे या खुले में एक आचार्य बैठे हैं और उनके आसपास उनके चार-पांच या दस बारह या बीस-पच्चीस शिष्य बैठे हैं। इस आसपास बैठेने का कोई मकसद तो होगा। मकसद था सृष्टि के बारे में सोचना, जीवन के बारे में सोचना, आत्मा और परमात्मा पर विचार विमर्श करना। बन्धन और मोक्ष के बारे में एक-दूसरे के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना।
आसपास बैठकर विचारों के इस अच्छी तरह के मन्थन का नाम पड़ गया उपनिषद। और उस उपनिषद में से जो साहित्य निकला उसका नाम पड़ गया उपनिषद साहित्य। एक शब्द आजकल चलता है- सेमिनार। जिसका हिन्दी रूपान्तरण हमने कर दिया हैं संगोष्ठी। जो अर्थ सेमिनार या संगोष्ठी का है ठीक वही अर्थ उपनिषद का है। आप चाहें तो सेमिनार का रूपान्तरण उपनिषद भी कर सकते हैं। यह बात अलग है कि पिछले जमाने में एक सी उपनिषदों यानी एक सी सेमिनारों में दर्शन का ही विवेचन होता रहा इसलिए उपनिषद साहित्य में बस दर्शन ही दर्शन मिलता है। तो पिछले जमाने में यानी कब? हमारा मतलब है कि कब लिखी गई थीं उपनिषदें? दो तरह से जांच करके इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए।
कुल 108 मानी जाने वाली उपनिषदों में से एक उपनिषद का नाम है मैत्रायणी उपनिषद। उसमें एक जगह अपने वक्त की एक खास ज्योतिष संबंधी स्थिति की तस्वीर खींची गई है। ज्योतिष के विद्वान कहते हैं कि यह स्थिति 2000 ईसा पूर्व के आसपास की है। मैत्रायणी उपनिषद पुरानी उपनिषदों में नहीं मानी जाती। अगर उसका समय 2000 ईसा पूर्व माना जा रहा है यानी आज से चार हजार साल पहले का माना जा रहा है तो जाहिर है कि प्राचीनतम उपनिषद का समय उससे चार-पांच सौ साल पहले का माना जा सकता है। संयोगवश यह वही समय है यानी 2500 ईसा पूर्व यानी आज से करीब साढ़े चार हजार साल पूर्व जब सिन्धु घाटी के किनारे (और देश में बाकी जगहों पर भी) हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे अति समृद्ध और सुविधा सम्पन्न शहर बसे हुए थे, जब ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हो रही थी और जब महाभारत का युद्ध हुए करीब पांच सौ साल बीत चुके थे।
दूसरी तरह से जांच करने पर भी हम इसी समय के करीब पहुंच जाते हैं। कैसे? ऐसे कि महाभारत के महाविनाश के बाद देश में विचारों का जो नया उन्मेष पैदा हुआ संसार और शरीर के प्रति विरक्ति का जो भाव बना और आत्मा की अमरता पर जैसी उत्कट भावाभिव्यक्ति होने लगी उसे देखते हुए उपनिषदों की ऊपरी समय सीमा वही जाकर बनती है जो ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल की है। यानी 2500 ई.पू.। हां, उसमें एक अनुमान सहज ही हो सकता है कि चूंकि देश में यज्ञों के प्रति उत्साह लगातार क्षीण हो रहा था और अध्यात्मविद्या का प्रभाव लगातर फैल रहा था इसलिए जहां ब्राह्मणों और आरण्यकों की रचना पांच-सात सौ सालों में हो चुकी होगी वहां उपनिषदों की रचना लगातार करीब एक हजार साल तक चलती रही होगी। जैसे हर कोई चाहता है कि उसके वंश का, कुनबे का या कौम का कोई पुराना संदर्भ निकल आए ताकि वह अपने को खूब प्रामाणिक साबित कर सके वैसी ही इच्छा संसार को असार मानने के बावजूद उपनिषदकारों को भी हो गई हो तो क्या हैरानी? आखिर थे तो वे भी आपके और हमारे जैसे मनुष्य।
तो जो 108 उपनिषदें मानी जाती हैं उनमें से दो सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा मशहूर उपनिषदें कभी उपनिषद के रूप में लिखी ही नहीं गई और उन्हें उपनिषद का दर्जा दे दिया गया। वे हैं ईशोपनिषद और बृहदारण्यकोपनिषद। ये दोनों लिखी नहीं गईं, इसका अर्थ यह है कि ये दोनों किसी दूसरी किताबों का हिस्सा हैं और चूंकि उनमें उसी दर्शन का मन्थन किया गया है जो उपनिषदों का प्रिय विषय है इसलिए उन्हें उनकी मूल किताबों में से निकाल कर स्वतंत्र उपनिषद का दर्जा दे दिया गया। जिसे हम ईशोपनिषद कहते हैं वह वास्तव में यजुर्वेद का चालीसवां यानी आखिरी अध्याय है और जिसे हम बृहदारण्यकोपनिषद कहते हैं वह असलियत में शतपथ ब्राह्मण का आखिरी अध्याय है। जैसे गीता महाभारत के भीष्मपर्व में होने के बावजूद एक स्वतंत्र पुस्तक का रूतबा हासिल कर चुकी है वैसी ही स्थिति ईशोपनिषद और बृहदारण्यकोपनिषद की भी बन गई है।
बृहदारण्यकोपनिषद का तो कुछ ऐसा आकर्षण बना कि पहले आरण्यककारों ने इसे आरण्यक कहना चाहा तो फिर अन्तत: उपनिषदकार इसे अपने कैम्प में खींच ले गए। इन दोनों अतिमहत्वपूर्ण उपनिषदों के अलावा ग्यारह और उपनिषदों को खूब महत्वपूर्ण जगह उपनिषद साहित्य में मिली। उनके नाम जान लेने में कोई हर्ज नहीं। ये हैं केन, कठ, प्रश्न, मण्डूक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, कौषीतकी, श्वेताश्वतर और मैत्रायणी। सवाल है कि 108 उपनिषदों में से इन तेरह उपनिषदों को ही क्यों इतना महत्वपूर्ण मान लिया गया? जवाब में कई कारण गिनाए जा सकते हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण तो यही है कि अपने जिस अध्यात्म संबंधी विषयवस्तु के कारण उपनिषदों के हमारे देश में खास इज्जत मिली इन तेरह उपनिषदों में इस अध्यात्म का बहुत ही शानदार विवेचन मिलता है। एक बार जब उपनिषदों का स्थान देश में ऊंचा हो गया तो फिर कई तरह के सम्प्रदायों ने अपने-अपने सम्प्रदाय और उसके इष्टदेव की प्रमुखता स्थापित करने के लिए उपनिषदों की अध्यात्म शैली का सहारा लिया।
पर इन तेरह उपनिषदों में ऐसा कुछ नहीं है और ब्रह्म, आत्मा, जगत बन्धन और मोक्ष पर ही बहस इनमें है। कुछ लोग श्वेताश्वतर को इस सन्दर्भ में इतना महत्व नहीं देते और उसे शैव सम्प्रदाय का उपनिषद मानना चाहते हैं जो एक हद तक ही ठीक है। पर फिर भी उसमें प्राय करके वैसा ही अध्यात्म चिंतन है जैसा शेष बारह उपनिषदों में है। इन तेरह उपनिषदों के अतिमहत्वपूर्ण होने का एक कारण यह भी माना जाता है कि ये शायद सर्वाधिक प्राचीन उपनिषदें हैं। जाहिर है कि जिस दार्शनिकता के लिए उपनिषदें विख्यात है वह विषय उनमें सर्वश्रेष्ठ तरीके से मिल जाता है और उन्हें की देखा देखी सम्प्रदाय संबंधी उपनिषदों की रचना उनसे बाद में ही की गई होगी। शायद इन तेरह उपनिषदों के इसी महत्व को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने इन्हीं में से दस उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा और जिन शेष तीन यानी कौषीतकी, श्वेताश्वतर और मैत्रायणी पर वे भाष्य नहीं लिख सके, उन्हें उन्होंने अपने शेष भाष्यों में उद्धृत किया है। श्वेताश्वतर पर वैसे तो एक शंकर व्याख्या मिलती है पर वह आदि शंकराचार्य की न होकर उनके किसी उत्तराधिकारी की मानी जाती है। शंकर जैसे मौलिक और प्रामाणिक दार्शनिक द्वारा इस तरह महत्व मिल जाने पर इन तेरह उपनिषदों का महत्व मानो और भी पुख्ता हो गया।
देश का विराट दार्शनिक चिंतन इन उपनिषदों में हमारे यहां पनपे नौ दार्शनिक स्कूलों में सुरक्षित है। इन नौ सम्प्रदायों में वेदों को महत्व न देने के कारण तीन अतिप्राचीन सम्प्रदायों चार्वाक, जैन, बौद्ध को नास्तिक सम्प्रदाय माना जाता है। नास्तिको वेदानिन्दक यानी नास्तिक वह है जो वेद की निन्दा करता है। तो वेदों में श्रद्धा रखने के कारण बाकी छह अपेक्षाकृत कम प्राचीन सम्प्रदायों न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त को आस्तिक सम्प्रदाय माना जाता है। दो खास हिस्सों में बंटे होने के बावजूद सभी नौ दार्शनिक स्कूलों या सम्प्रदायों का बराबर का महत्व इस देश में रहा है। इन सभी नौ के नौ सम्प्रदायों के बीज वेदों और उपनिषदों में हैं और वहीं से इनका विकास हुआ।
पर इन सभी में उपनिषदों का महत्व सर्वाधिक माना गया और उनका दार्शनिक चिंतन सर्वश्रेष्ठ माना गया तो वह अकारण नहीं। कारण यह है कि जहां दार्शनिक स्कूलों की पुस्तकों में दर्शन का विवेचन सिद्धांतों, तर्कवितर्को और खण्डन-मण्डनों में बंधा है वहीं उपनिषदों में वह वैसा ही सहज प्रवाहपूर्ण और स्वत: स्फूर्त है जैसा गीता में है।
गुरुवार, 2 जनवरी 2014
वेदों पश्चात् मनुस्मृति ही सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है।
वेदों के पश्चात सर्वमान्य महर्षि मनु द्वारा रचित ग्रन्थ मनुस्मृति की आयु क्या है अर्थात यह लगभग कितना पुराना है ?
स्वयंभू मनु पहले मनुष्य हैं। सारी धरती पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु जी का नाम समाहित है। उनका नाम न आए तो मनुष्य अपनी पहचान भी न जान पाए। अंग्रज़ी में मनुष्य को मैन कहा जाता है। इसमें भी मनु के नाम के 3 अक्षर मौजूद हैं। हिब्रू और अरबी में उन्हें आदम कहा जाता है और उनकी औलाद को बनी आदम कहा जाता है। आदम नाम की धातु ‘आद्य’ संस्कृत में आज भी पाई जाती है। वास्तव में स्वयंभू मनु और आदम एक ही शख्सियत के दो नाम हैं।
संस्कृत में मनुस्मृति के नाम से उनकी शिक्षाओं का एक संकलन भी मिलता है । उनकी शिक्षाओ के रचनाकाल अथवा उनकी शिक्षाओं के संकलन के रचनाकाल पर विचार करना ही इस आलेख का उद्देश्य है ।
स्वामी दयानन्द जी ने वेद की भांति मनुस्मृति को भी सृष्टि के आदि में हुआ माना है। सृष्टि के आदि विषय में स्वामी जी ने मनु को बताया है और मनुस्मृति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष पुराना माना है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में मनुस्मृति के विषय में कहा है -
‘यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है’ (सत्यार्थप्रकाश,एकादशसमुल्लास,पृ.187)
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा है -
‘यह जो वर्त्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें (7) वैवस्त मनु का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव 1, स्वारोचिष 2, औत्तमि 3, तामस 4, रैवत 5, चाक्षुष 6, ये छः तो बीत गए हैं और सातवां वैवस्वत वर्त्त रहा है.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17)
स्वामी जी ने बताया है कि एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगियां होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष, त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मन्वन्तर अर्थात 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लिखे जाते समय तक सातवें मन्वन्तर के भी 120532976 वर्ष बीत चुके थे। इस तरह स्वामी जी के अनुसार उस समय तक स्वयंभू मनु को हुए कुल 1960852976 वर्ष, एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष बीत चुके थे।
स्वामी जी ने यही काल स्वयंभू मनु का बताया है, और उस काल के स्वयंभू मनु को मनु स्मृति का स्मृतिकार बतलाया है । उसमें जो श्लोक मनु के नाम से कहे गए हैं, वास्तव में उन्हें गुरू - शिष्य परम्परा में श्रुति - वाचिक प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी स्मरण कर्तेभुये संरक्षित किया जा रहा था , जिसे बाद में लिपिबद्ध कर लिया गया । मनु स्मृति का स्वयंभू मनु से ही संबंध है। हालाँकि स्वामी दयानंद जी ने मनु स्मृति को प्रक्षिप्त मानकर उसके कुछ श्लोकों को नहीं माना है । उन्होंने कहा है कि मनुस्मृति के कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हैं और उनका कुछ पता नहीं है कि उन्हें कब और किसने लिखा है?
अब इस लेख में हम पर्याप्त तर्कों व् प्रमाणों से सिद्ध करेंगे कि मनुस्मृति आज के अंतरजाल के अनुसार भी वेदों पश्चात् मनुस्मृति ही सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। मनु महाराज की पुस्तक मनुस्मृति महाभारत काल तथा रामायण काल से भी अधिक प्राचीन है अर्थात कम से कम 12220 वर्ष से लाखों वर्ष से पूर्व तक विधमान थी । यहाँ हमने कम से कम 12220 वर्ष पूर्व लिखा है अतः ये उससे भी अधिक प्राचीन है किन्तु निश्चित समय बता पाना अभी के लिए सम्भव नही ।
महाभारत काल -
सभी को विदित है की महाभारत का समय लगभग 3000 ईसा पूर्व का था अर्थात आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व । यदि प्रमाण चाहे तो यहाँ जाएँ वैज्ञानिक पद्धति दवरा विश्लेषण किया गया है -
https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/xx
महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक -
महर्षि वेदव्यास (कृष्णद्वेपायन ) रचित महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनु में महाभारत वा व्यास जी का नाम तक नही ।
महाभारत में मनु महाराज की प्रतिष्ठा -
मनुनाSभिहितम् शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन ! महाभारत अनुशासन पर्व , अ० ४ ७ - श ० ३ ५
तैरेवमुक्तोंभगवान् मनु: स्वयम्भूवोSब्रवीत् । महाभारत शांतिपर्व , अ० ३ ६ - श ० ५
एष दयविधि : पार्थ ! पूर्वमुक्त : स्वयम्भूवा । महाभारत अनुशासन पर्व , अ० ४ ७ - श ० ५ ८
सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् । महाभारत शांतिपर्व , मोक्षधर्म आदि ।
अतः सिद्ध होता है कि मनु महाभारत के समय उपस्थित थी तभी महाभारत रचयिता ने स्वयं राजसी मनु के कथनो को प्रमाण स्वरुप लिखा है ।
अब प्रतिवादी तर्क कर सकता है कि मनु महाभारत में थी ये तो स्पष्ट हो गया परन्तु श्लोकबद्ध मनु उस समय उपलब्ध थी वा नही ? ये स्पष्ट नही हुआ ।
अतः अब ये देखें -
अद्भ्योSग्निब्रार्हत: क्षत्रमश्मनो लोहमुथितं ।
तेषाम सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिशु शाम्यति ।। - मनु अ० ९ - ३ २ १
ठीक यही मनु का श्लोक महाभारत शांतिपर्व अ० ५ ६ - श २ ४
में आया है और महाभारत के इस श्लोक से ठीक पूर्व २ ३ वें श्लोक में आया है -
"मनुना चैव राजेंद्र ! गीतो श्लोकों महात्मना"
अर्थात हे राजेंद्र ! मनु नाम महात्मा ने इन श्लोकों को कहा है !
इसी प्रकार मनु के जो जो श्लोक ज्यों के त्यों महाभारत में है ;
मैं यहाँ अब केवल उनके श्लोक नम्बर ही लिखा रहा हूँ
मनु ० १ १ /७ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ५
मनु ० १ १ /१२ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ९
मनु ० १ १ /१८ ० - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ३ ७
मनु ० ६ /४५ - महा० शांति अ ० २४५ - श ० १५
मनु ० २ /१२० - महा०अनु ० अ ०१०४ - श ० ६४
अब वो श्लोक लिखते है जो मनु के है परन्तु कुछ परिवर्तन के साथ आयें है -
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: ।
यश्च विप्रोSनधियान स्त्रयते नाम बिभ्रति । । - मनु २ /१५७
यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: ।
ब्राह्मणश्चानधियानस्त्रयते नाम बिभ्रति । । -महा शांति ३६/४७
अब केवल उनके श्लोक नम्बर ही लिखा रहा हूँ जो कुछ परिवर्तन के साथ आयें है -
मनु ० १ १ /४ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ४
मनु ० १ १ /१२ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ७
मनु ० १ १ /३७ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० २ २
मनु ० ८ /३७२ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ६३
मनु ० २ /२३१ - महा० शांति अ ० १०८ - श ० ७
मनु ० ९ /३ - महा० अनु अ ० ४६ - श ० १४
मनु ० ३ /५५ - महा० अनु अ ० ४६ - श ० ३
लगभग मनु के ५ ० ऐसे श्लोक है जो ज्यों के त्यों वा कुछ परिवर्तन के साथ महाभारत में आये है ।
इतने प्रमाणो के रहते कोण कह सकता है कि मनु महाभारत समय में श्लोकबद्ध अवस्था में न थी ?
अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु कम से कम 5000 वर्ष तो पुरानी है ही !!
रामायण काल -
वैसे तो आदि सृष्टि संवत के गणनानुसार श्रीराम का जन्म आज से करीब तेइस लाख वर्ष पूर्व त्रेतायुग में हुआ था। आधुनिक पश्चिमी विद्वानों व इतिहासकारों के मध्य रामायण काल का समय लगभग 7300 ईसा पूर्व का माना जाता है अर्थात आज से लगभग 9300 वर्ष पूर्व । यदि प्रमाण चाहे तो यहाँ जाएँ वैज्ञानिक पद्धति दवरा विश्लेषण किया गया है -
https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/ram
http://www.bookganga.com/eBooks/Books/Details/5484187422894534051
वाल्मीकि रामायण में मनुस्मृति के श्लोक -
महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा आयी है किन्तु मनु में वाल्मीकि , राम जी आदि का नाम तक नही ।
वाल्मीकि रामायण में मनु महाराज की प्रतिष्ठा -
किष्किन्धा काण्ड में जब श्री राम अत्याचारी बाली को घायल कर उसके आक्षेपों के उत्तर में अन्यान्य कथनो के साथ साथ यह भी कहते है कि तूने अपने छोटे भाई सुग्रीव कि स्त्री को बलात हरण कर और उसे अपनी स्त्री बना अनुजभार्याभिमर्श का दोषी बन चूका है , जिसके लिए (धर्मशास्त्र ) में दंड कि आज्ञा है ।
इस पृथिवी के महाराज भरत है (अतः तू भी उनकी प्रजा है ) ; मैं उनकी आज्ञापालन करता हुआ विचरता हूँ फिर में तुझे यथोचित दंड कैसे ना देता ? जैसे -
श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्र वत्सलौ ||
गृहीतौ धर्म कुशलैः तथा तत् चरितम् मयाअ || वाल्मीकि ४-१८-३०
राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || वाल्मीकि ४-१८-३१
शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते |
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् || वाल्मीकि ४-१८-३२
उपरोक्त श्लोक ३० में मनु का नाम आया है और श्लोक ३१ , ३२ भी मनु महाराज के ही है !
उपरोक्त श्लोक किंचित पाठभेद (परन्तु जिससे अर्थ में कुछ भी भेद नही आया ) मनु अध्याय ८ के है ! जिनकी संख्या कुल्लूकभट्ट कि टिकावली में ३१८ व् ३१९ है -
राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || वाल्मीकि ४-१८-३१
राजभिः धूर्त दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || मनु ८ / ३१८
शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते |
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् || वाल्मीकि ४-१८-३२
शसनाद्वा अपि मोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद विमुच्यते |
अशासित्वा तू तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ मनु ८/३१६
अतः यह सिद्ध हुआ कि श्लोकबद्ध मनु रामायण के पूर्व भी विधमान थी । यदि कोई कहे ये क्यों न माना
जाये कि उपरोक्त दोनो श्लोक वाल्मीकि से मनु में आयें हो ?
इसका उत्तर यह है कि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनु में वाल्मीकि , राम जी आदि का नाम तक नही और रामायण में स्पष्टतः मनु के श्लोकों (मनुना गीतौ श्लोकौ) कि प्रशंसा विधमान है ठीक उसी प्रकार जैसे महाभारत में थी "मनुना चैव राजेंद्र ! गीतो श्लोकों महात्मना" - महाभारत शांतिपर्व अ० ५ ६ - श २ ३
अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु कम से कम 9000 वर्ष तो पुरानी है ही !!
किन्तु -
चीन से प्राप्त पुरातात्विक प्रमाण -
विदेशी प्रमाणो मनुस्मृति के काल तथा श्लोको कि संख्या की जानकारी कराने वाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण चीनी मिला है । सन १९३२ में जापान ने बम विस्फोट द्वारा चीन कि ऎतिहासिक दीवार को तोडा तो उसमे से एक लोहे का ट्रंक मिला जिसमे चीनी भाषा कि प्राचीन पांडुलिपियां भरी थी । वे हस्तलेख Sir Augustus Fritz George के हाथ लग गये वो उन्हें लंदन ले गया और ब्रिटिश म्युजियम में रख दिया ।
उन हस्तलेखों को Prof. Anthony Graeme ने चीनी विद्वानो से पढ़वाया तो जानकारी मिली -
चीन के राजा Chin-Ize-Wang ने अपने शासनकाल में यह आज्ञा दी कि सभी प्राचीन पुस्तकों को नष्ट कर दिया जावे जिससे चीनी सभ्यता के सभी प्राचीन प्रमाण नष्ट हो जावे । तब किसी विद्याप्रेमी ने पुस्तकों को ट्रंक में छिपाया और दीवार बनते समय चिनवा दिया । संयोग से ट्रंक विस्फोट से निकल आया ।
चीनी भाषा के उन हस्तलेखों मेसे एक में लिखा है -
'मनु का धर्मशास्त्र भारत में सर्वाधिक मान्य है जो वैदिक संस्कृत में लिखा है और दस हजार वर्ष से अधिक पुराना है'
तथा इसमें मनु के श्लोकों कि संख्या 630 भी बताई गई है किन्तु वर्त्तमान में मनु में 2400 के आस पास श्लोक है ।
The wording is such as to pay high tribute to the genius and influence of the Emperor, but it also proves that many hundreds of years ago this Emperor and his people were possessed of knowledge and ideals, laws, and principles which we are apt to think are quite modern. For instance, The manuscript shows that the Chinese emperor and his people had adopted the Laws of Manu which were written in the Vedic language ten thousand years ago.
- http://rosicrucian.50webs.com/hsl/hsl-light-from-china.htm
यह विवरण मोटवानी कि पुस्तक 'मनु धर्मशास्त्र : ए सोशियोलॉजिकल एंड हिस्टोरिकल स्टडीज' पेज २३२ पर भी दिया है ।
इसके अतिरिक्त R.P. Pathak कि Education in the Emerging India में भी पेज १४८ पर है जो लिंक हम आपको दिए देते है -
ये गूगल पुस्तक है -
http://books.google.co.in/books?id=z_OCjp-T2vIC&pg=PA148&lpg=PA148&dq=Chin-Ize-Wang&source=bl&ots=l2ZvnPXZ9z&sig=F9jLXhHQtOm9-jwGTXjkz9KBzQw&hl=en&sa=X&ei=ZcOGUrPZI46BrgepiIGQCQ&ved=0CDMQ6AEwAQ#v=onepage&q=Chin-Ize-Wang&f=false
इस दीवार के बनने का समय लगभग 220–206 BC बताया जाता है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220BC से पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा 220+10000 = 10220 ईसा पूर्व ; आज से 12,220 वर्ष पूर्व कम से कम तक मनुस्मृति उपलब्ध थी ।
अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु अब से कम से कम 12220 वर्ष पूर्व से और प्राचीन हो चुकी है !
साथ साथ ही यदि वेदों कि बात करें तो
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम ।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम् ॥ मनु १/१३
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारो ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराये उस ब्रह्मा ने अग्नि , वायु, आदित्य और [तु अर्थात ] अंगिरा से ऋग , यजुः , साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया ।
वेदोSखिलो धर्ममूलम् । मनु २/६
वेद सम्पूर्ण धर्म (कानून Law) का मूल है ।
यः कश्चित्कस्यचिधर्मो मनुना परिकीर्तित : ।
स सर्वोSभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ मनु २/९
मनु ने जिस किसी को जो कुछ भी धर्म कहा है वह सब वेद के अनुकूल ही है , क्योकि वेद सर्वमान्य है ।
नास्तिको वेदनिंदकः । मनु २/११
वेद कि निंदा करने वाले नास्तिक (अनीश्वरवादी) है
इत्यादि अनेक वचन है जो वेद के सन्दर्भ में मनु में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है इसमें लेशमात्र भी संदेह नही ।
मनु में जहाँ कहीं भी वेद विरुद्ध आचरण दिखे वो प्रक्षेप (मिलावट ) है अतः त्याज्य है ।
मनु को जानने के लिए -
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बुधवार, 21 अगस्त 2013
भारतवर्ष के पतन का कारण विद्वत्ता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास - अशोक "प्रवृद्ध"
भारतवर्ष के पतन का कारण विद्वत्ता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास
महाभारत के युद्ध में योद्धाओं की संख्या में अपार हानि हुई थी। महाभारत -युद्ध में योद्धाओं, क्षत्रियों का महान विनाश होने पर देश राजनितिक विचार स्व असुरक्षित और हिन् होना चाहिए था , परन्तु महाभारत के काल से लेकर अशोक के निधन तक देश में कोई भी विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था।
इससे यह बात स्पष्ट होती है कि विशाल संख्या में क्षत्रिय योद्धाओं के मरने पर भी भारतवर्ष राजनितिक दृष्टि से दुर्बल नहीं हुआ था।
भारतवर्ष में दुर्बलता आई थी बौद्धिक दृष्टि से , भारतवर्ष में विद्वता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास आने से , और ब्राह्मणत्व में ह्रास महाभारत युद्ध के पूर्व से ही आरम्भ हो चूका था , जो युद्धोपरांत तेजी से हुआ। जिसके कारण अहिन्सावादियों अर्थात बौद्धों, जैनों और नास्तिकों को पनपने का मौका मिला । फलतः विदेशियों को हमला करने की हिम्मत हुई और हम सदियों तक विदेशी दासता में जकड़ने को बाध्य हुए। आज भी हम विदेशी मानसिकता और विदेशी शासन से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाए हैं।
शनिवार, 6 जुलाई 2013
भारतीय स्वर्णिम काल के अधोगति का कारण ब्राह्मण वर्ग में ब्राह्मणत्व का ह्रास तथा बौद्ध धर्म का अभ्युदय - अशोक "प्रवृद्ध"
भारतवर्ष में, जो कभी आर्यावर्त्त कहलाता था और जिसकी दुन्दुभि विश्व
में गूँजती थी, उसमें वैदिक काल से आरम्भ कर इसके अन्तिम स्वर्ण काल
तक अनेक काल आते गए। वे सब परिवर्तन के प्रतीक थे। समाज और समाज
के घटक मनुष्य, के जीवन में परिवर्तन प्रकृति का नियम है और यह
अवश्यम्भावी है। स्थिर जीवन अवगति का कारण बन जाता है। तब
प्रकृति ही उसे अवगति की ओर धकेलने के लिए बाध्य हो जाती है।
भारत के स्वर्णकाल के उपरान्त यह परिवर्तन ऐसी तीव्र गति से होने
लगा कि प्रकृति भी उसको रोक नहीं पाई और वह अधोगति की ओर अग्रसर
होने लगा। मानव प्राणी उससे त्रस्त होकर छटपटाने लगा था। यह
कलिकाल था। भारत के सभी प्रदेशों पर महाभारत युद्ध का दुष्परिणाम
अभी तक चला आ रहा था। युवा क्षत्रियों का व्यापक अभाव हो गया था।
अराजकता व्याप्त थी।
उस अराजकता में ब्राह्मण वर्ग अपनी आजीविका न चला सकने के कारण
पठन-पाठन, अध्ययन-अध्यापन का कार्य छोड़कर विभिन्न प्रकार के
व्यवसायों में प्रवृत्त हो गया था। उसी प्रक्रिया में उसने मन्दिर बनवाए,
उनमें विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ स्थापित कीं। कालान्तर में उन
मन्दिरों और मूर्तियों के भी अनेक रूप बन गए पूजा प्रकार और पद्धति में
व्यवापकता के नाम पर संकीर्णता समा गई, परिणाम-स्वरूप समाज में
विकृति व्याप गई। तब एक युग ऐसा भी आया जो मद्य, मांस और मुद्रा-
मैथुन का युग कहलाया।
इस परिवर्तन की प्रक्रिया में आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध
का जन्म हुआ। कहा जाता है कि बुद्ध ने सामाजिक विकृति से बचने
का उपाय खोजने का यत्न किया। तब एक नए सम्प्रदाय का प्रचलन
प्रारम्भ हुआ। कालान्तर में कदाचित् वह भी विकृत होने लगा और कुछ
सौ वर्षों के उपरान्त उन दोनों विकृत परम्पराओं में परस्पर संघर्ष होने
लगे। वे संघर्ष व्यक्ति और समाज तक ही सीमित न रहकर राज्यों में फैल
गए। दोनों प्रकार की विचारधाराएँ स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का यत्न
करने लगीं।
देवानाम्प्रिय अशोक के राज्यकाल में बौद्ध सम्प्रदाय भारत पर छा जाने के
लिए प्राणपण की बाजी लगाने लगा था। बुद्ध का तथाकथित
शान्ति अहिंसा सद्भावना का सन्देश किसी गहन में समा गया था। राज्य
दारोगा का कार्य करने लगा था।
यह लगभग कलि संवत् 1660 के काल की घटना है। पाटलिपुत्र के सिंहासन
पर अशोक विराजमान था। बौद्य धर्म की स्थापना के नाम पर वह भारतवर्ष
के विभिन्न राज्यों में एक प्रकार से सेंध लगा रहा था। कश्मीर में उस समय
महाराज जलौक का राज्य था। जलौक स्वयं शैव था किन्तु उसके राज्य में
सभी नागरिकों को सम्प्रदाय स्वन्त्रता प्राप्त थी। उसका ही यह परिणाम
था कि उसके राज्य में जहाँ एक ओर शैव मत अपनी दिशा में मन्थर गति से
चल रहा था वहाँ उसका एक अन्य सम्प्रदाय भैरव के नाम पर भैरवी चक्र में
चक्रायित हो रहा था। वैष्णवों के लिए भी उस राज्य में उतना ही स्थान था।
महाराज स्वयं शैव था।
अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए, कश्मीर से कन्याकुमारी तथा अटक
से कटक तक के राज्य के लिए महाराज अशोक ने अपना धर्मचक्र
चलाना आरम्भ किया तो सर्वप्रथम उसकी दृष्टि कश्मीर
की उर्वरा भूमि की ओर गई और उसको बौद्ध सम्पद्राय में सम्मिलित करने
के लिए बौद्ध भिक्षुओं को वहाँ भेजा। मार्तण्ड का सूर्य मन्दिर और
वहाँ का विशाल पुस्तकालय उस घुन के पहले शिकार बने। संयोगवश महाराज
जलौक को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने उसकी पुनर्प्रतिष्ठा की। किन्तु
अपने राज्य में फैलने वाले बौद्धमत को रोकने के लिए उनको बहुत प्रयत्न
करना पड़ा।
इस तथ्य से भारतवासी भलीभाँति परिचित हैं कि सर्वथा शान्तिप्रिय
अहिंसक मित्रता का व्यवहार करने वाला, जीवदया का प्रणेता होने पर
भी भारतवासियों ने बौद्ध सम्प्रदाय को सहर्ष स्वीकार नहीं किया। क्यों ?
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आज तक भी अनुत्तरित ही है।
विगत 2500 वर्षों में संसार में अनेक परिवर्तन हुए हैं। साम्राज्य ढहे,
साम्राज्य बने। प्राचीनता का लोप होता गया, नवीनता उसका स्थान
लेती गई। शान्ति और युद्ध का संघर्ष चलता रहा। किन्तु संसार ने बौद्ध
मत को स्वीकार नहीं किया। न केवल इतना, अपितु बौद्ध सम्प्रदाय
की उद्गम भूमि भारत में तो यह सर्वथा उखड़ ही गया है। विदेशों के बौद्ध
यात्री भले भी बौद्ध स्थलों की यात्रा के लिए इस देश में आते हों, किन्तु
इस देश के यात्रियों तथा पर्यटकों को उनमें ऐसी कोई रुचि नहीं दिखाई देती।
आज जब भारतीयों में पर्यटन प्रवृत्ति पनपने लगी है तो कोई- कोई इन
स्थलों पर पर्यटनों की दृष्टि से भले ही जाने की इच्छा करता हो, किन्तु
उन्हें अपने पूर्वजों की थाली समझकर, उनके प्रति श्रद्धा-भाव रखते हुए
जाने वालो की संख्या नगण्य ही है।


