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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

सत्यमेव जयते अथवा सत्यमेव जयति

सत्यमेव जयते अथवा सत्यमेव जयति?

हमारे देश भारतवर्ष की संघीय व्यवस्था में अशोक की लाट शासन के प्रतीक के तौर
पर स्वीकारा गया है और उसके साथ अंकित रहता है प्रेरक वाक्य ‘सत्यमेव
जयते’ । ‘संस्कृत सूक्ति रत्नाकर’ नाम की पुस्तक में सत्यमेव जयते शब्द
अंकित है और वहां इसका संदर्भ दिया है मुण्डकोपनिषद् । किंतु वहां ‘जयते’
के स्थान पर ‘जयति’ है । विविध संस्कृत शब्दकोश के अनुसार एवं व्याकरण
की दृष्टि से ‘जयते’ गलत है और उसके स्थान पर होना चाहिए ‘जयति’ ।
उल्लेखनीय है कि ‘जयति’ भ्वादिगण के परस्मैपदी धातु ‘जि’ से प्राप्त
क्रियापद है । हां, ‘परा’ तथा ‘वि’ उपसर्गों के साथ ‘जि’ धातु
आत्मनेपदी रहता है और तदनुसार ‘पराजयते’ एवं ‘विजयते’ सही हैं, किंतु
‘जयते’ नहीं । उक्त प्रेरक वाक्य में यह त्रुटि कैसे आयी और
किसी संस्कृतज्ञ ने शासन का ध्यान आरंभ में उस ओर
क्यों नहीं खींचा यह जानना रोचक होगा ।
सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ।।
(मुण्डकोपनिषद् 3/1/6)
शब्दार्थ के अनुसार यह वचन कहता है कि सत्य की ही जय अंत में होती है,
न कि असत्य की । यही सत्य उस देवयान नामक मार्ग पर छाया है जिसके
माध्यम से ऋषिगण, जिनकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों, सत्य के परम धाम
परमात्मा तक पहुंचते हैं ।
वैदिक चिंतन में जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्षप्राप्ति है और
मानवयोनि उसके लिये विवेकमय एक अवसर प्रदान करती है । इस योनि के
द्वारा ही वह देवत्व या सच्चिदानंद की आध्यात्मिक अवस्था तक पहुंच
सकता है । मेरे मत में इस वचन की सार्थकता शुद्ध रूप से आध्यात्मिक है ।
सत्य ही उस अंतिम लक्ष्य तक ले जाता है, न कि असत्य
जो उसको जन्ममरण के अनवरत चल रहे चक्र में बांधे रहता है ।
लेकिन मैंने देखा है कि व्याख्याकार उक्त वाक्य की अर्थवत्ता रोजमर्रा के
जीवन में भी समान रूप से दर्शाते हैं । मैं नहीं मानता कि इस संसार में सत्य
सदैव विजयी रहता है । अनुभव बताता है कि सत्य तथा असत्य के बीच
संघर्ष निरंतर चलता रहता है । कभी सत्य सफल होता है तो कभी असत्य
उसके ऊपर हावी हो जाता है । यदि सत्य असत्य के ऊपर
विजयी हो ही चुका हो तो बारंबार असत्य के साथ लड़ने
की स्थिति क्यों बनती ? मैं यही मानता हूं कि एहिक लोक में दोनों अस्तित्व
में रहते हैं । दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे के सापेक्ष रहता है । असत्य
का अस्तित्व सदैव रहता है और वह मनुष्य को पूरी ताकत से अपने पक्ष में
किये रहता है । सत्य मनुष्य को उससे मुक्त करने को संघर्षरत रहता है ।
कभी वह सफल होता है तो कभी असफल । मैं यही मानता हूं
कि ऋषियों द्वारा ‘सत्यमेव जयति’ विशुद्ध आध्यात्मिक संदर्भ में
ही कहा गया होगा, न कि भौतिक संसार के संदर्भ में ।

बुधवार, 21 अगस्त 2013

भारतवर्ष के पतन का कारण विद्वत्ता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास - अशोक "प्रवृद्ध"

भारतवर्ष के पतन का कारण विद्वत्ता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास
  
महाभारत के युद्ध में योद्धाओं की संख्या में अपार हानि हुई थी। महाभारत -युद्ध में योद्धाओं, क्षत्रियों का महान विनाश होने पर देश राजनितिक विचार स्व असुरक्षित और हिन् होना चाहिए था , परन्तु महाभारत के काल से लेकर अशोक के निधन तक देश में कोई भी विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था।
इससे यह बात स्पष्ट होती है कि विशाल संख्या में क्षत्रिय योद्धाओं के मरने पर भी भारतवर्ष राजनितिक दृष्टि से दुर्बल नहीं हुआ था।
भारतवर्ष में दुर्बलता आई थी बौद्धिक दृष्टि से , भारतवर्ष में विद्वता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास आने से , और ब्राह्मणत्व में ह्रास महाभारत युद्ध के पूर्व से ही आरम्भ हो चूका था , जो युद्धोपरांत तेजी से हुआ। जिसके कारण अहिन्सावादियों अर्थात बौद्धों, जैनों और नास्तिकों को पनपने का मौका मिला । फलतः विदेशियों को हमला करने की हिम्मत हुई और हम सदियों तक विदेशी दासता में जकड़ने को बाध्य हुए। आज भी हम विदेशी मानसिकता और विदेशी शासन से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाए हैं।

रविवार, 18 अगस्त 2013

वैदिक देवता

वैदिक देवता
दिव्य गुण और देने वाले को देवता कहते हैं। जो दूसरों को सिर्फ दे बिना कुछ
वापस लेने की इक्छा के | इस प्रकार जो कोई भी यह दैव गुण रखता हैं उसे
देवता कह सकते हैं | इस प्रकार देवता २ प्रकार से वर्गीकृत होते हैं एक जड़
और एक चेतन | जड़ देवता ३३ हैं | ८ वसु, ११ रूद्र, १२ आदित्य, १
यज्ञ, १ विघु ये कुल ३३ जड़ देवता कहे गए हैं |
पहले हम इनका विवरण देते हैं |
८ वसु हैं – सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश
(यह सब हमें कुछ ना कुछ देते हैं लेते नहीं)
११ रूद्र हैं – दस प्राण और ग्यारहवी जीवात्मा
१२ आदित्य हैं – बारह मास
जड़ देवताओ का पूजन कैसे किया जाए अब यह प्रश्न उठता हैं | क्या धुप,
दीप, अगरबत्ती से इनका पूजन हो जाएगा | नहीं , इन चीजों से ना होकर
अपितु जड़ देवताओ का पूजन देव यज्ञ से होगा | हवन करिये वातावरण में
जो गंदगी हम फैला रहे हैं वह साफ़ करना भी हमारा कर्तव्य हैं | प्रतिक्षण
कितनी मृत त्वचा गिरती हैं | वायु हम कितनी अशुद्ध करते हैं और वातावरण
से जो भी अन्न लेते हैं उसमे लगभग सभी जड़ देवताओ का योगदान हुआ |
हवन कर के हम वापस उनका कुछ अंश उन देवताओ को लौटा देते हैं | और
इसीलिए कहा गया के यज्ञ से बचा हुआ ही हम ले | हम यज्ञ की अग्नि में
यह कहते हुए समिधा डाले के इदम नमम् | यह
मेरा नहीं प्रकृति का प्रकृति को लौटते हैं | दीप अगरबत्ती तो अशुद्ध रूप
आगये बिना जिस से किसी भी लक्ष्य की पूर्ति नहीं होती |
अब आते हैं चेतन देवताओ पर और उनके पूजन पर | चेतन देवता ५ कहे गए
हैं
१ परमात्मा, गुरु, माता-पिता, पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति,
और अथिति
सम्पूर्ण वेद हमें सवितु देव परमात्मा के बारे में बताते हैं | मातृदेवो भव,
पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव
परमात्मा का ध्यान करना उसके अधिक से अधिक गुणों को आचरण में
लाना ही उसकी सच्ची पूजा हैं |
माता पिता का श्राद्ध और तर्पण करना उनकी पूजा हैं | यानी श्रद्धापूर्वक
धर्मानुसार उनकी आगया माननी चाहिए |
सबका गुरु परमात्मा हैं | पर भिन्न विषयो में जिन तपस्वियों ने तप किया हैं
उनको उन विषयों पर गुरु बनाना चाहिए | और वे गुरु जो समाज उद्धार के
लीये शिक्षा दान करे जो पदार्थ का तत्वों का ज्ञान कराये वह गुरु देव हैं |
विवाह यज्ञ हैं जो समाज हित के लिए कहा जाता हैं | वैदिक समाज में पति-
पत्नी एक दूसरे को ईश प्राप्ति में सहायता करते हैं | यही विवाह
का उद्देश्य होता हैं अतः वे देवी-देव कहे गए हैं एक दूसरे के लिए |
अतिथि को हम लोगो ने मान लिया हैं के जो बिना तिथि के आ जाए अरे
बिना तिथि के तो घर चोर-लुटेरे भी आ जाते हैं | अतिथि उसे कहते हैं
जिसका आचरण अच्छा हू | जो धर्मानुसार व्यहवार करता हो | और उसमे
दैव गुण हो |
जड़ पूजा का अर्थ सिर्फ इतना हैं के उन तत्वों का यथा योग्य उपयोग
किया जाए | चेतन की पूजा यह हैं के उस व्यक्तित्व के अधिक से अधिक
अच्छे गुणों को आचरण में लाया जाए | इसी प्रकार जड़ और चेतन
पूजा की जानी चाहिए |

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

संध्या-उपासना हेतु वैदिक मन्त्र

ईश्वरस्तुतिप्रार्थानोपासना- मंत्र
स्वामी दयानंद सरस्वती
संध्या उपासना हेतु वैदिक मनर -
ओ३म्। विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव।
यद् भ॒द्रन्तन्न॒ आ सुव ॥१॥
अर्थ – हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकत्-र्ता, समग्र
ऐश्वर्ययुक्त (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखें कें दाता परतेश्वर! आभ
कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पुर्ण (दुरितानि) दुर्गुण, दुव्-र्यसन
और दुःखों को (परा, सुव) दुर कर दूजिए, (यत्) जो (भद्रम्)
कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव आर पदार्थ है (तत्) वह सब
हमको (आ, सुव) प्रप्त कीजिए॥१॥
हि॒र॒ण्य॒गर्भः सम॑वत्-र्त॒ताग्रे॑ भूतस्य॑ जातः पति॒रेक॑ आसीत्।
स दा॑धार पृथि॒वीन्ध्यामुतेमाक्ङस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम।२॥ यर्ज० १३।
२
(अर्थ) – जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप आर जिसने प्रकाश
करने-हारे सुर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये है,
जो (भुतस्य) उत्पन्न हुए सम्पुर्ण जगत् का (जातः) ;प्रसिद्ध (पतिः)
स्वामी (एकः) एक ही चेतन-स्वरूप (आसोत्) था, जो (अग्रे) सब जगत्
के उत्पन्न होने से पुर्व (समवत्-र्तत) वर्तमान था, (सः) सो (इमाम्)
इस (पृथिवीम्) भुमि (उत) आर (ध्याम्) सुर्यादि को (दाधार) धारण कर
यहा है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए
(हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से (विधेम) विशेष
भकि्त किया करें॥२॥
य आ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य विश्व॑ उ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॒ दे॒वाः ।
यस्य॒ छा॒याऽमृतं॒ यस्य मृत्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥३॥ – यजु०
२५।११
अर्थ – (यः) जो (आतमदाः) आत्मज्ञान का दाता, (बलदाः) शरीर,
आत्मा और समाज के बल का देनेहाया, (यस्य) जीसकी (विश्वे) सब
(देवाः) विद्धान् लोग (उपासे) उपासना करते हैं, और (यस्य)
जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष, सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात
शिक्षा को मानते हैं, (यस्य) जिसका (छाया) आश्रय हू (अमृतम्)
मोक्षसुखदायक है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थस् भकि्त न
करना ही (मृत्युः) मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै)
सुस्वरूप (देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमास्मा की लिए (हविषा)
आस्मा और अन्सःकरण से (विधेम) भकि्स अर्थात् उसी की आ
ज्ञा पालन में सस्पर रहें॥३॥
यः प्रा॑ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑ ।
य ईशे॑ऽअ॒स्य व्दिपद॒श्पदः कस्मै॑ ढे॒वाय॒ ह॒विषा॑ विधेम ॥४॥यजु० २३ ।३
अर्थ – (यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमीषतः) अप्राणिरूप
(जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा से (एक इत्) एक
ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव) है, (यः) जो (अस्य) इस
(द्धिपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः) गौ आदि प्राणियों कें शरीर
की (ईशे) करता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य
के देहv66रे परमात्मा के (हविशा) अपनी सकल उत्तम से (विधेम) विशेष
भकि्त करें ॥४॥
येन॒ ध्यौरूग्रा पृ॑थि॒वी च॑ ढृढा येन॒ स्वॆ॒ सतभितं येन॒ नाकः॑।
योऽअन्तरि॑क्षे कज॑सो वि॒मानः कस्मै॑ देवाय॑ हविषा॑ विधेम ॥५॥ – यजु०
३२।६१
अर्थ – (येन) जिस परमात्मा ने (उग्र) तीक्ष्ण स्वभाववाले (ध्यौः)
सूर्य आदी (च) और (पृथिवी) भूमि को (दढा) धारण, (येन) जिस
जगदीश्वर (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण, और (येन) जिस (नाकः)
दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है। (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में
(रजसः) सब लोक-लोकान्तरों को (विमानः) विशेषमानुक्त अर्थात
जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता और
भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक (देवाय)
कामना करने के योग्य परब्रहा की प्राप्-ति के लिए (हविषा) सब
सामथ्-र्य से (विधेम) विशेष भकि्त करें॥५॥
प्रजा॑पते॒ न त्वढेतान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि परि॒ ता व॑भूव।
यत्का॑मास्ते जुहुमस्तन्नो॑ऽअस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयीणाम् ॥६॥
अर्थ – हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मन्! (त्वत्) आपसे
(अन्यः) भीन्न दुसरा कोई (ता) उन (एतानी) एन (विश्वा) सब
(जातानि) उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को (न) नहीं (परि, बभूव)
तिरस्कार करता है अर्थात् आप सर्वोपरि है। (यत्कामाः) जिस-जिस
पदार्थ की कामनावाले हम लोग (ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और
वाञ्छा करें, (तत) उस-उसकी कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्सु)
होवे, जिससे (वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्य के (पतयः)
स्वामी (स्याम) होवें ॥६॥
सनो॒ बन्धरजनिता स विधा॒ता धामा॑नि वे॒द भुव॑नानि॒ विश्वा॑।
यत्र॑ देवा अ॒मृत॑मानशा॒नास्तृतीये॒ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥७॥
अर्थ – हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामि परमात्मन! (त्वत) आपसे
(अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि) इन (वश्वा) सब
(जातानि) उत्पन्न हए जड़-चेतनादिकों को (न) नही (परि, बभूव)
तिरस्कार करता है अर्थात आप सर्वोपरि हैं (यत्कामाः) जिस-जिस
पदार्थ की कामनावाले हम लोग (से) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और
वाञ्छा करें, (तत्) उस-उसकी कामरा (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे,
जिससे (वयम्) हम लोग (रयीणाम) धनैश्वर्यो के (पतयः)
स्वामी (स्याम) होवें ॥८॥
अग्ने॒ नय सु॒पथा॑ रायेऽअस्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् ।
युयो॒ध्य स्मज्जु॒हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिंविधेम ॥८॥
अर्थ-(हे अग्ने) स्वप्रकाशक ज्ञानस्वरूप सब जगत् के प्रकाश करने-
हारे (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर! आप दिससे (विव्दान) सम्पुर्ण
विध्य-युवत हैं, कृपा करके (अस्मान्) हम लोगों को (राये) विज्ञान
वा राज्यादि ऐश्वर्य कि प्राप्-ति के लिए (सुपथा) अच्छे, धर्मयुक्त,
अप्त लोगों के मार्ग से (विश्वानिं) सम्पुर्ण
(वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय) प्राप्-त कराइए, और
(अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त (एनः) पापरूप कर्म
को (युयोधि) दुर कीजिए। इस कारण हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्)
बहुत प्रका की स्तुतिरूप (नमउकि्तम्)
नम्रतापुर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा रिया कें और सर्वदा आनन्द में रहें। ॥
८।।

रविवार, 4 अगस्त 2013

भारतवर्ष पर इस्लाम का प्रथम आक्रमण - अशोक "प्रवृद्ध"

भारतवर्ष पर इस्लाम का प्रथम आक्रमण
      अशोक "प्रवृद्ध"
विक्रमी संवत् 769 में भारतवर्ष (हिन्दुस्थान) पर इस्लाम का प्रथम
आक्रमण हुआ था, जिसे कुछ अंशों में ही सफल आक्रमण
कहा जा सकता है। यह आक्रमण समुद्र मार्ग से किया गया था और भारत
के पश्चिमी भाग सिन्ध देश पर हुआ था।
इससे पूर्व भी इस देश पर विदेशी आक्रमण होते रहे थे, किन्तु इस्लाम
का यह आक्रमण उन सबसे भिन्न था। इस आक्रमण का उद्देश्य केवल
भारत देश की धन सम्पत्ति पर अधिकार करना, मात्र नहीं अपितु इससे
कहीं अधिक था। देश पर अधिकार करना, उस आक्रमण का एक उद्देश्य होने
पर भी उसका कारण कुछ और ही था। वह कारण था, इस देश में ‘इस्लाम’
का प्रचार करना। यही कारण है कि यह आक्रमण बगदाद स्थित इस्लाम के
खलीफा की ओर से किया गया था।
खलीफा न केवल बगदाद का शासक ही था अपितु वह इसके अतिरिक्त
इस्लाम, जो महजब के रूप में विद्यमान है, का कर्णधार भी था। वास्तव में
बगदाद में उसकी नियुक्ति भी इसी प्रकार द्विविध उद्देश्य के लिए की गई
थी। एक तो उस प्रदेश पर शासन करना और दूसरे उस प्रदेश में इस्लाम
का प्रचार-प्रसार करना।
इस्लाम एक मजहब है इस महजब का प्रचलन मक्का निवासी मोहम्मद ने
किया था, जो स्वयं को परमात्मा का पैगाम लानेवाला-सन्देशवाहक
कहता था। इसी कारण वह कालान्तर में पैगम्बर कहलाने लगा और आज वह
इसी नाम से जाना जाता है।
मोहम्मद साहब का यह सौभाग्य था कि उनका विवाह एक धनी महिला से
हुआ था। इस कारण उनको आजीविका की किसी प्रकार की कोई
चिन्ता नहीं रही। परिणामस्वरूप उनके मस्तिष्क में भाँति भाँति की कल्पनाएँ
उड़ान भरने लगीं। इस प्रकार कई वर्ष तक चिन्तन करने के उपरान्त उन्होंने
स्वयं को परमात्मा का सन्देश वाहक अर्थात् पैगम्बर घोषित कर दिया। इस
घोषणा के साथ ही उन्होंने अपने कल्पित परमात्मा और उसके सन्देश
को सुनाना आरम्भ किया। इस पर वह पैगम्बर के रूप में विख्यात हो गया।
अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उसने अपनी एक
निजी सेना भी गठित करनी आरम्भ कर दी और समय पाकर वह इसके लिए
युद्ध भी करने लगा। इस प्रकार मोहम्मद साहब ने परमात्मा और मनुष्य के
रहन-सहन आदि-आदि के विषय में अपनी एक धारणा बनाई और अपने
विचारों को अपनी उस निजी सेना के बल पर जन-साधारण पर
थोपना आरम्भ कर दिया।
आरम्भ में जैसा कि स्वाभाविक है, मोहम्मद साहब को अपने इस कार्य में
अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई। इसके विपरीत उनको अपने पैतृक स्थान
मक्का से भागकर मदीना जाना पड़ा था। वहाँ जाकर उन्होंने
अपनी स्थिति पर विचार किया और फिर अपने सैनिकों को अधिक
प्रोत्साहन देने के लिए उनको अपने प्रकार की सुविधाएँ देने का आश्वासन
दिया। उसका पारिणाम यह हुआ कि उनके सैनिक अधिक उत्साह से जन
साधारण पर बल प्रयोग करने लगे।
मोहम्हद ने, जो अब हजरत मोहम्मद कहे जाने लगे थे, अपने
सैनिकों को आदेश दिया कि जिस किसी नगर, कबीला आदि के लोग
उसको पैगम्बर रूप में स्वीकार नहीं करते; वे उन पर आक्रमण कर दें।
उनको यह अधिकार दिया गया कि वे उस स्थान से धन सम्पत्ति, मकान
खेमे, आभूषण अथवा औरतें, जो कुछ भी देखें अपने अधिकार में कर लें, उन्हें
लूट लें, जिस प्रकार चाहें और जो चाहें वे सब अपने अधिकार में कर लें। उस
लूट और अधिकार का पाँचवाँ भाग वे हजरत मोहम्मद को नजर कर शेष सब
कुछ को परमात्मा की ओर से दिया गया समझकर उस पर अपना पूर्ण
अधिकार समझें।
इस घोषणा से मोहम्मद साहब के सैनिकों के मन उछल पड़े। उनके लिए यह
बहुत बड़ा आकर्षण था और मोहम्मद साहब के लिए यह बहुत
बड़ी सफलता का कारण सिद्ध हुआ। मोहम्मद साहब की ओर से
उनको किसी प्रकार का वेतन नहीं मिलता था। जो भी मोहम्मद
को परमात्मा का पैगम्बर स्वीकार कर लेता उसको ही सेना में भरती होने
का अवसर प्राप्त हो जाता था। अतः मदीना में बेकार घूमनेवाले
सभी मोहम्मद के सेवक बन गए और फिर झुण्ड-के-झुण्ड बनाकर आसपास
के नगरों, कबीलों, गाँवों और घरों पर आक्रमण करने लगे। धन सम्पत्ति और
महिलाओं को लूटने का ऐसा आकर्षण था कि वे बेकार लोग प्राण प्रण से
आक्रमण करते और जितना अधिक से-अधिक लूट मचा सकते थे, अत्याचार
कर सकते थे, वह सब करते।
इस आक्रमण और लूट में उनको जो कुछ भी प्राप्त
होता था उसका पाँचवाँ भाग वे मोहम्मद को नजर कर देते और शेष भाग के
स्वयं स्वामी बनकर उसका उपभोग करते।
इस प्रकार मोहम्मद साहब का राज्य-वृद्धि करने लगा। जो भी क्षेत्र
मोहम्मद के अधीन हो जाता उसके निवासियों को न केवल मोहम्मद
को अपना शासक स्वीकार करना पड़ता था, अपितु उनको मोहम्मद के
मजहबी विचारों को भी मानना पड़ता था। उन विचारों में जो मुख्य बात
थी वह यह कि ‘मोहम्मद रसूले इलाही है’ अर्थात् मोहम्मद इस संसार में
परमात्मा के पैगम्बर के रूप में प्रकट हुआ है।
मोहम्मद के ऐसे कृत्यों के आधार पर ही प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक ‘गिब्बन’ ने
लिखा है-इस्लाम एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुरान लेकर विस्तार
पा रहा है।’
इस आक्रमण और विचार-प्रसार का यह परिणाम हुआ कि मोहम्मद साहब
का राज्य ही स्थापित हो गया था। मोहम्मद की दृष्टि में अपना राज्य और
अपना दीन मजहब दोनों एक ही बात थे।
मिस्र देश में एक लेखक हुए हैं-प्रो. इनान। उन्होंने अपनी पुस्तक
‘दि डिसाइसिव मोमेंट्स इन दि हिस्ट्री ऑफ इस्लाम’1 में लिखा है कि जब
मोहम्मद साहब का राज्य स्थापित हो गया तो उन्होंने अपने आसपास के
राज्यों को लिखा कि वे उसके राज्य से सम्बन्ध स्थापित कर लें। किन्तु
उसमें उन्होंने यह शर्त भी रख दी थी कि वे ‘दीने-इस्लाम’ को भी स्वीकार
करें। यदि वे मोहम्मद को परमात्मा का दूत स्वीकार करें तो यह मान
लिया जाएगा कि उस राज्य की मोहम्मद के राज्य से मित्रता है।
अन्यथा उस राज्य को शत्रु राज्य माना जाएगा।
इससे स्पष्ट लक्षित होता है कि मोहम्मद अपने जीवनकाल में स्वयं
ही राज्य और मजहब को एक ही बात मानता था।
प्रो. इनान ने यह तो नहीं लिखा कि मोहम्मद साहब की मित्रता के इस
निमन्त्रण को उसके समीपवर्ती किस-किस राज्य ने स्वीकार कर
लिया और किस-किस ने इसको अस्वीकार किया। किन्तु उसने यह अवश्य
लिखा है कि अपने किस-किस पड़ोसी देश को हजरत मोहम्मद ने इस प्रकार
का मैत्री सन्देश अथवा निमन्त्रण भेजा था।
मोहम्मद के देहान्त के उपरान्त उसके राज्य के प्रबन्धकर्ता को ‘खलीफा’
की उपाधि दी गई और उसका यह कर्त्तव्य माना गया कि वह मोहम्मद
साहब के पद चिन्हों पर चलकर उनके राज्य पर शासन करे और
उसकी वृद्धि भी करे।
इस प्रकार खलीफाओं का शासन चलने लगा। कुछ कालोपरान्त, जब तीसरे
खलीफा के शासनकाल में इराक में इस्लामी राज्य स्थापित हुआ
तो खलीफा ने अरब के रेतीले प्रदेश को छोड़ दिया और इराक
की राजधानी बगदाद को ही अपनी राजधानी घोषित कर दिया।
खलीफा हारूँ रशीद के शासनकाल में उसके राज्य सिपहसालार मोहम्मद-
बिन-कासिम ने भारत के सिन्ध प्रदेश पर आक्रमण किया। भारत पर यह
उसका प्रथम सफल आक्रमण सिद्ध हुआ। यद्यपि इससे पूर्व भी भारत
को धन-धान्य से सम्पन्न देश मानकर इस्लामी आक्रमण का असफल
प्रयास हुआ था।

देवता - अशोक "प्रवृद्ध"

देवता
  अशोक "प्रवृद्ध"
जो पदार्थ हमारे लिए उपयोगी होते हैं वो देवता कहलाते हैं । लेकिन वेदों में
ऐसा कहीं नहीं कहा गया कि हमे उनकी उपासना करनी चाहिए । ईश्वर
देवताओं का भी देवता है और इसीलिए वह महादेव कहलाता है , सिर्फ और
सिर्फ उसी की ही उपासना करनी चाहिए ।
2. वेदों में 33 कोटि का अर्थ 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 प्रकार (संस्कृत में
कोटि शब्द का अर्थ प्रकार होता है) के देवता हैं । और ये शतपथ ब्राह्मण
में बहुत ही स्पष्टतः वर्णित किये गए हैं, जो कि इस प्रकार है :
8 वसु (पृथ्वी, जल, वायु , अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र ),
जिनमे सारा संसार निवास करता है ।
10 जीवनी शक्तियां अर्थात प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान,
नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त , धनञ्जय ), ये तथा 1 जीव ये ग्यारह रूद्र
कहलाते हैं
12 आदित्य अर्थात वर्ष के 12 महीने
1 विद्युत् जो कि हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी है
1 यज्ञ अर्थात मनुष्यों के द्वारा निरंतर किये जाने वाले निस्वार्थ कर्म ।
शतपथ ब्राहमण के 14 वें कांड के अनुसार इन 33 देवताओं
का स्वामी महादेव ही एकमात्र उपासनीय है । 33 देवताओं का विषय अपने
आप में ही शोध का विषय है जिसे समझने के लिए सम्यक गहन अध्ययन
की आवश्यकता है । लेकिन फिर भी वैदिक शास्त्रों में इतना तो स्पष्ट
वर्णित है कि ये देवता ईश्वर नहीं हैं और इसलिए
इनकी उपासना नहीं करनी चाहिए ।
3. ईश्वर अनंत गुणों वाला है । अज्ञानी लोग अपनी अज्ञानतावश उसके
विभिन्न गुणों को विभिन्न ईश्वर मान लेते हैं ।
4. ऐसी शंकाओं के निराकरण के लिए वेदों में अनेक मंत्र हैं जो ये स्पष्ट
करते हैं कि सिर्फ और सिर्फ एक ही ईश्वर है और उसके साथ
हमारा सम्पर्क कराने के लिए कोई सहायक, पैगम्बर, मसीहा,
अभिकर्ता (एजेंट) नहीं होता है ।
यजुर्वेद 40.1
यह सारा संसार एक और मात्र एक ईश्वर से पूर्णतः आच्छादित और
नियंत्रित है । इसलिए कभी भी अन्याय से किसी के धन
की प्राप्ति की इच्छा नहीं करनी चाहिए अपितु न्यायपूर्ण आचरण के
द्वारा ईश्वर के आनंद को भोगना चाहिए । आखिर वही सब सुखों का देने
वाला है ।
ऋग्वेद 10.48.1
एक मात्र ईश्वर ही सर्वव्यापक और सारे संसार का नियंता है । वही सब
विजयों का दाता और सारे संसार का मूल कारण है । सब जीवों को ईश्वर
को ऐसे ही पुकारना चाहिए जैसे एक बच्चा अपने पिता को पुकारता है ।
वही एक मात्र सब जीवों का पालन पोषण करता और सब सुखों का देने
वाला है ।
ऋग्वेद 10.48.5
ईश्वर सारे संसार का प्रकाशक है । वह कभी पराजित नहीं होता और न
ही कभी मृत्यु को प्राप्त होता है । वह संसार का बनाने वाला है ।
सभी जीवों को ज्ञान प्राप्ति के लिए तथा उसके अनुसार कर्म करके सुख
की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए । उन्हें ईश्वर की मित्रता से
कभी अलग नहीं होना चाहिए ।
ऋग्वेद 10.49.1
केवल एक ईश्वर ही सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वालों को सत्य
ज्ञान का देने वाला है । वही ज्ञान की वृद्धि करने वाला और धार्मिक
मनुष्यों को श्रेष्ठ कार्यों में प्रवृत्त करने वाला है । वही एकमात्र इस सारे
संसार का रचयिता और नियंता है । इसलिए कभी भी उस एक ईश्वर
को छोड़कर और किसी की भी उपासना नहीं करनी चाहिए ।
यजुर्वेद 13.4
सारे संसार का एक और मात्र एक ही निर्माता और नियंता है । एक
वही पृथ्वी, आकाश और सूर्यादि लोकों का धारण करने वाला है । वह स्वयं
सुखस्वरूप है । एक मात्र वही हमारे लिए उपासनीय है ।
अथर्ववेद 13.4.16-21
वह न दो हैं, न ही तीन, न ही चार, न ही पाँच, न ही छः, न ही सात, न
ही आठ, न ही नौ , और न ही दस हैं । इसके विपरीत वह सिर्फ और सिर्फ
एक ही है । उसके सिवाय और कोई ईश्वर नहीं है । सब देवता उसमे निवास
करते हैं और उसी से नियंत्रित होते हैं । इसलिए केवल
उसी की उपासना करनी चाहिए और किसी की नहीं ।
अथर्ववेद 10.7.38
मात्र एक ईश्वर ही सबसे महान है और उपासना करने के योग्य है ।
वही समस्त ज्ञान और क्रियाओं का आधार है ।
यजुर्वेद 32.11
ईश्वर संसार के कण-कण में व्याप्त है । कोई भी स्थान उससे खाली नहीं है
। वह स्वयंभू है और अपने कर्मों को करने के लिए उसे किसी सहायक,
पैगम्बर, मसीहा या अवतार की जरुरत नहीं होती । जो जीव उसका अनुभव
कर लेते हैं वो उसके बंधनरहित मोक्ष सुख को भोगते हैं ।
वेदों में ऐसे असंख्य मंत्र हैं जो कि एक और मात्र एक ईश्वर का वर्णन करते
हैं और हमें अन्य किसी अवतार, पैगम्बर या मसीहा की शरण में जाये
बिना सीधे ईश्वर की उपासना का निर्देश देते हैं।