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बुधवार, 21 अगस्त 2013

भारतवर्ष के पतन का कारण विद्वत्ता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास - अशोक "प्रवृद्ध"

भारतवर्ष के पतन का कारण विद्वत्ता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास
  
महाभारत के युद्ध में योद्धाओं की संख्या में अपार हानि हुई थी। महाभारत -युद्ध में योद्धाओं, क्षत्रियों का महान विनाश होने पर देश राजनितिक विचार स्व असुरक्षित और हिन् होना चाहिए था , परन्तु महाभारत के काल से लेकर अशोक के निधन तक देश में कोई भी विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था।
इससे यह बात स्पष्ट होती है कि विशाल संख्या में क्षत्रिय योद्धाओं के मरने पर भी भारतवर्ष राजनितिक दृष्टि से दुर्बल नहीं हुआ था।
भारतवर्ष में दुर्बलता आई थी बौद्धिक दृष्टि से , भारतवर्ष में विद्वता अर्थात ब्राह्मणत्व में ह्रास आने से , और ब्राह्मणत्व में ह्रास महाभारत युद्ध के पूर्व से ही आरम्भ हो चूका था , जो युद्धोपरांत तेजी से हुआ। जिसके कारण अहिन्सावादियों अर्थात बौद्धों, जैनों और नास्तिकों को पनपने का मौका मिला । फलतः विदेशियों को हमला करने की हिम्मत हुई और हम सदियों तक विदेशी दासता में जकड़ने को बाध्य हुए। आज भी हम विदेशी मानसिकता और विदेशी शासन से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाए हैं।

रविवार, 4 अगस्त 2013

भारतवर्ष में भेद-भाव का आरम्भ - अशोक "प्रवृद्ध"

भारतवर्ष में भेद-भाव का आरम्भ
    अशोक "प्रवृद्ध"
भारतवर्ष में बुद्धि से अविचारित भावना के कारण ही मत-मतान्तर के
आधार पर जन-जन में भेदभाव उत्पन्न होने लगा है। भारत में यह विभेद
महात्मा बुद्ध के काल से आरम्भ हुआ है।
‘‘यद्यपि महात्मा बुद्ध का यह आशय नहीं था। उन्होंने तो कर्म और
व्यवहार में शुद्धता और सरलता ही लाने का यत्न किया था। परन्तु उस
व्यवहार में सरलता का कोई दिग्दर्शन न रह पाने से शुद्धता और
सरलता केवल नाम की ही रह गई और ‘बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं
गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि’ का घोष प्रमुख हो गया है। उससे श्रद्धा में
अपार वृद्धि हुई है किन्तु आचरण पतन की ओर प्रवृत्त हो गया है।
‘‘समाज में मानव पथ-प्रदर्शन तो सामयिक ही होता है, स्थायी पथ-
प्रदर्शन धर्म-साहित्य होता है। जब तक महात्मा बुद्ध का जीवन रहा, तब
तक किसी सीमा तक उनका जीवन उनके शिष्यों और भक्तों का पथ-
प्रदर्शन करता रहा किन्तु उनकी मृत्यु के उपरान्त ऐसी कोई वस्तु
नहीं रही जो उनका पथ-प्रदर्शन कर पाती। प्राचीन धर्मग्रन्थों पर से
बुद्ध के जीवन काल में ही आस्था को समाप्त कर दिया गया था। स्वयं
बुद्ध ने कुछ नवीन रचना की नहीं।
‘‘इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि बौद्ध समाज दिशाविहीन हो गया और
उसके फलस्वरूप समस्त समाज ही दिशाविहीन हो गया। इसका यह
भी दुष्परिणाम हुआ कि शताधिक मत-मतान्तरों की सृष्टि हो गई। बुद्ध से
पूर्व प्रजा में एक आधार पर ही बंटवारा पाया जाता था। वह आधार था कर्म
का। कर्म के आधार पर बंटवारा होता था। संसार में दो ही प्रकार के कर्म हैं।
एक कर्म होता है दैवी और दूसरा होता है आसुरी। इसके आधार पर प्रजानन
या तो दैवी स्वभाव के होते थे या फिर आसुरी स्वभाव के। परन्तु जब से
भावनाओं का आवेश हुआ है तब से दलबन्दियां होने लगी हैं जो कि आधार
रहित हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि लोग बुद्धियुक्त व्यवहार को छोड़कर
दल-बन्दियों के पीछे चल पड़े हैं।
‘इसकी जड़ें बड़ी गहन पैठ गई हैं। अब इस समय समझाने से इसका कुछ
भी प्रभाव नहीं होगा। बुद्धिरहित विचार करने से तो भावना अटल
ही बनी रहती है और फिर सब अपनी-अपनी भावना के अनुसार व्यवहार
करते हैं। किसी दूसरे की कोई सुनने को तैयार ही नहीं होता।

भारतवर्ष पर इस्लाम का प्रथम आक्रमण - अशोक "प्रवृद्ध"

भारतवर्ष पर इस्लाम का प्रथम आक्रमण
      अशोक "प्रवृद्ध"
विक्रमी संवत् 769 में भारतवर्ष (हिन्दुस्थान) पर इस्लाम का प्रथम
आक्रमण हुआ था, जिसे कुछ अंशों में ही सफल आक्रमण
कहा जा सकता है। यह आक्रमण समुद्र मार्ग से किया गया था और भारत
के पश्चिमी भाग सिन्ध देश पर हुआ था।
इससे पूर्व भी इस देश पर विदेशी आक्रमण होते रहे थे, किन्तु इस्लाम
का यह आक्रमण उन सबसे भिन्न था। इस आक्रमण का उद्देश्य केवल
भारत देश की धन सम्पत्ति पर अधिकार करना, मात्र नहीं अपितु इससे
कहीं अधिक था। देश पर अधिकार करना, उस आक्रमण का एक उद्देश्य होने
पर भी उसका कारण कुछ और ही था। वह कारण था, इस देश में ‘इस्लाम’
का प्रचार करना। यही कारण है कि यह आक्रमण बगदाद स्थित इस्लाम के
खलीफा की ओर से किया गया था।
खलीफा न केवल बगदाद का शासक ही था अपितु वह इसके अतिरिक्त
इस्लाम, जो महजब के रूप में विद्यमान है, का कर्णधार भी था। वास्तव में
बगदाद में उसकी नियुक्ति भी इसी प्रकार द्विविध उद्देश्य के लिए की गई
थी। एक तो उस प्रदेश पर शासन करना और दूसरे उस प्रदेश में इस्लाम
का प्रचार-प्रसार करना।
इस्लाम एक मजहब है इस महजब का प्रचलन मक्का निवासी मोहम्मद ने
किया था, जो स्वयं को परमात्मा का पैगाम लानेवाला-सन्देशवाहक
कहता था। इसी कारण वह कालान्तर में पैगम्बर कहलाने लगा और आज वह
इसी नाम से जाना जाता है।
मोहम्मद साहब का यह सौभाग्य था कि उनका विवाह एक धनी महिला से
हुआ था। इस कारण उनको आजीविका की किसी प्रकार की कोई
चिन्ता नहीं रही। परिणामस्वरूप उनके मस्तिष्क में भाँति भाँति की कल्पनाएँ
उड़ान भरने लगीं। इस प्रकार कई वर्ष तक चिन्तन करने के उपरान्त उन्होंने
स्वयं को परमात्मा का सन्देश वाहक अर्थात् पैगम्बर घोषित कर दिया। इस
घोषणा के साथ ही उन्होंने अपने कल्पित परमात्मा और उसके सन्देश
को सुनाना आरम्भ किया। इस पर वह पैगम्बर के रूप में विख्यात हो गया।
अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उसने अपनी एक
निजी सेना भी गठित करनी आरम्भ कर दी और समय पाकर वह इसके लिए
युद्ध भी करने लगा। इस प्रकार मोहम्मद साहब ने परमात्मा और मनुष्य के
रहन-सहन आदि-आदि के विषय में अपनी एक धारणा बनाई और अपने
विचारों को अपनी उस निजी सेना के बल पर जन-साधारण पर
थोपना आरम्भ कर दिया।
आरम्भ में जैसा कि स्वाभाविक है, मोहम्मद साहब को अपने इस कार्य में
अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई। इसके विपरीत उनको अपने पैतृक स्थान
मक्का से भागकर मदीना जाना पड़ा था। वहाँ जाकर उन्होंने
अपनी स्थिति पर विचार किया और फिर अपने सैनिकों को अधिक
प्रोत्साहन देने के लिए उनको अपने प्रकार की सुविधाएँ देने का आश्वासन
दिया। उसका पारिणाम यह हुआ कि उनके सैनिक अधिक उत्साह से जन
साधारण पर बल प्रयोग करने लगे।
मोहम्हद ने, जो अब हजरत मोहम्मद कहे जाने लगे थे, अपने
सैनिकों को आदेश दिया कि जिस किसी नगर, कबीला आदि के लोग
उसको पैगम्बर रूप में स्वीकार नहीं करते; वे उन पर आक्रमण कर दें।
उनको यह अधिकार दिया गया कि वे उस स्थान से धन सम्पत्ति, मकान
खेमे, आभूषण अथवा औरतें, जो कुछ भी देखें अपने अधिकार में कर लें, उन्हें
लूट लें, जिस प्रकार चाहें और जो चाहें वे सब अपने अधिकार में कर लें। उस
लूट और अधिकार का पाँचवाँ भाग वे हजरत मोहम्मद को नजर कर शेष सब
कुछ को परमात्मा की ओर से दिया गया समझकर उस पर अपना पूर्ण
अधिकार समझें।
इस घोषणा से मोहम्मद साहब के सैनिकों के मन उछल पड़े। उनके लिए यह
बहुत बड़ा आकर्षण था और मोहम्मद साहब के लिए यह बहुत
बड़ी सफलता का कारण सिद्ध हुआ। मोहम्मद साहब की ओर से
उनको किसी प्रकार का वेतन नहीं मिलता था। जो भी मोहम्मद
को परमात्मा का पैगम्बर स्वीकार कर लेता उसको ही सेना में भरती होने
का अवसर प्राप्त हो जाता था। अतः मदीना में बेकार घूमनेवाले
सभी मोहम्मद के सेवक बन गए और फिर झुण्ड-के-झुण्ड बनाकर आसपास
के नगरों, कबीलों, गाँवों और घरों पर आक्रमण करने लगे। धन सम्पत्ति और
महिलाओं को लूटने का ऐसा आकर्षण था कि वे बेकार लोग प्राण प्रण से
आक्रमण करते और जितना अधिक से-अधिक लूट मचा सकते थे, अत्याचार
कर सकते थे, वह सब करते।
इस आक्रमण और लूट में उनको जो कुछ भी प्राप्त
होता था उसका पाँचवाँ भाग वे मोहम्मद को नजर कर देते और शेष भाग के
स्वयं स्वामी बनकर उसका उपभोग करते।
इस प्रकार मोहम्मद साहब का राज्य-वृद्धि करने लगा। जो भी क्षेत्र
मोहम्मद के अधीन हो जाता उसके निवासियों को न केवल मोहम्मद
को अपना शासक स्वीकार करना पड़ता था, अपितु उनको मोहम्मद के
मजहबी विचारों को भी मानना पड़ता था। उन विचारों में जो मुख्य बात
थी वह यह कि ‘मोहम्मद रसूले इलाही है’ अर्थात् मोहम्मद इस संसार में
परमात्मा के पैगम्बर के रूप में प्रकट हुआ है।
मोहम्मद के ऐसे कृत्यों के आधार पर ही प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक ‘गिब्बन’ ने
लिखा है-इस्लाम एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुरान लेकर विस्तार
पा रहा है।’
इस आक्रमण और विचार-प्रसार का यह परिणाम हुआ कि मोहम्मद साहब
का राज्य ही स्थापित हो गया था। मोहम्मद की दृष्टि में अपना राज्य और
अपना दीन मजहब दोनों एक ही बात थे।
मिस्र देश में एक लेखक हुए हैं-प्रो. इनान। उन्होंने अपनी पुस्तक
‘दि डिसाइसिव मोमेंट्स इन दि हिस्ट्री ऑफ इस्लाम’1 में लिखा है कि जब
मोहम्मद साहब का राज्य स्थापित हो गया तो उन्होंने अपने आसपास के
राज्यों को लिखा कि वे उसके राज्य से सम्बन्ध स्थापित कर लें। किन्तु
उसमें उन्होंने यह शर्त भी रख दी थी कि वे ‘दीने-इस्लाम’ को भी स्वीकार
करें। यदि वे मोहम्मद को परमात्मा का दूत स्वीकार करें तो यह मान
लिया जाएगा कि उस राज्य की मोहम्मद के राज्य से मित्रता है।
अन्यथा उस राज्य को शत्रु राज्य माना जाएगा।
इससे स्पष्ट लक्षित होता है कि मोहम्मद अपने जीवनकाल में स्वयं
ही राज्य और मजहब को एक ही बात मानता था।
प्रो. इनान ने यह तो नहीं लिखा कि मोहम्मद साहब की मित्रता के इस
निमन्त्रण को उसके समीपवर्ती किस-किस राज्य ने स्वीकार कर
लिया और किस-किस ने इसको अस्वीकार किया। किन्तु उसने यह अवश्य
लिखा है कि अपने किस-किस पड़ोसी देश को हजरत मोहम्मद ने इस प्रकार
का मैत्री सन्देश अथवा निमन्त्रण भेजा था।
मोहम्मद के देहान्त के उपरान्त उसके राज्य के प्रबन्धकर्ता को ‘खलीफा’
की उपाधि दी गई और उसका यह कर्त्तव्य माना गया कि वह मोहम्मद
साहब के पद चिन्हों पर चलकर उनके राज्य पर शासन करे और
उसकी वृद्धि भी करे।
इस प्रकार खलीफाओं का शासन चलने लगा। कुछ कालोपरान्त, जब तीसरे
खलीफा के शासनकाल में इराक में इस्लामी राज्य स्थापित हुआ
तो खलीफा ने अरब के रेतीले प्रदेश को छोड़ दिया और इराक
की राजधानी बगदाद को ही अपनी राजधानी घोषित कर दिया।
खलीफा हारूँ रशीद के शासनकाल में उसके राज्य सिपहसालार मोहम्मद-
बिन-कासिम ने भारत के सिन्ध प्रदेश पर आक्रमण किया। भारत पर यह
उसका प्रथम सफल आक्रमण सिद्ध हुआ। यद्यपि इससे पूर्व भी भारत
को धन-धान्य से सम्पन्न देश मानकर इस्लामी आक्रमण का असफल
प्रयास हुआ था।

रविवार, 28 जुलाई 2013

पुरातन ग्रंथों में सोना बनाने की विधि - अशोक "प्रवृद्ध"

पुरातन ग्रंथों में सोना बनाने की विधि
   अशोक "प्रवृद्ध"
प्राचीनकाल में रसायनज्ञ पारद या पारे से सोना बनाने की विधि जानते
थे.यह बात आज कपोल कल्प्ना या मिथ सरीखी लगती है जबकी इसके कई
प्रमाण मौज़ूद हैं.सच्चाई यह है कि य प्रकिया बेहद कठिन और अनुभव
सिद्ध है.तमाम कीमियाग़र सोना बनाने में नाकामयाब रहे, कुछ थोडे से
जो सफल रहे उन्होने इस विद्या को गलत हाथों में पडने के डर से इसे बेहद
गोपनीय रखा.
राक्षस दैत्य दानवों के गुरू भृगु ऋषि जिन्हें शुक्राचार्य के नाम से
भी संबोधित किया जाता है, उन्होंने ऋग्वेदीय उपनिषद श्रीसूक्त के माध्यम
से सोना बनाने का तरीका बताया है. श्रीसूक्त के मंत्र व प्रयोग बहुत गुप्त
व सांकेतिक भाषा में बताया गया है. संपूर्ण श्रीसूक्त में 16 मंत्र हैं.
भारत के नागार्जुन, गोरक्षनाथ आदि ने इन मत्रों की रसायनिक दृष्टि से
सोना बनाने की कई विचित्र विधियाँ, कई स्थानों और कई ग्रंथों में बताई
गयी हैं. अर्थात, श्रीसूक्त के पहले तीन मंत्रों में सोना बनाने की विधि,
रसायनिक व्याख्या और उनका गुप्त भावार्थ, आपके समक्ष प्रस्तुत
किया जा रहा है.
श्रीसूक्त का पहला मंत्र
ॐ हिरण्य्वर्णां हरिणीं सुवर्णस्त्र्जां।
चंद्रां हिरण्यमणीं लक्ष्मीं जातवेदो मआव॥
शब्दार्थ – हिरण्य्वर्णां- कूटज, हरिणीं- मजीठ, स्त्रजाम- सत्यानाशी के
बीज, चंद्रा- नीला थोथा, हिरण्यमणीं- गंधक, जातवेदो- पाराम, आवह-
ताम्रपात्र.
विधि – सोना बनाने के लिए एक बड़ा ताम्रपात्र लें, जिसमें लगभग 30
किलो पानी आ सके. सर्वप्रथम, उस पात्र में पारा रखें. तदुपरांत, पारे के
ऊपर बारीक पिसा हुआ गंधक इतना डालें कि वह पारा पूर्ण रूप से ढँक जाए.
उसके बाद, बारीक पिसा हुआ नीला थोथा, पारे और गंधक के ऊपर धीरे धीरे
डाल दें. उसके ऊपर कूटज और मजीठ बराबर मात्रा में बारीक करके पारे,
गंधक और नीले थोथे के ऊपर धीरे धीरे डाल दें और इन सब वस्तुओं के
ऊपर 200 ग्राम सत्यानाशी के बीज डाल दें. यह सोना बनाने
का पहला चरण है
श्रीसूक्त का दूसरा मंत्र
तां मआवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं।
यस्या हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहं॥
शब्दार्थ – तां- उसमें, पगामिनीं- अग्नि, गामश्वं- जल, पुरुषानहं- बीस.
विधि – ऊपर बताए गए ताँबे के पात्र में पारा, गंधक, सत्यानाशी के बीज
आदि एकत्र करने के उपरांत, उस ताम्रपात्र में अत्यंत सावधानीपूर्वक जल
इस तरह भरें कि जिन वस्तुओं की ढेरी पहले बनी हुई है, वह तनिक भी न
हिले. तदनंतर, उस पात्र के नीचे आग जला दें. उस पात्र के पानी में, हर
एक घंटे के बाद, 100 ग्राम के लगभग, पिसा हुआ कूटज, पानी के ऊपर
डालते रहना चाहिए. यह विधि 3 घंटे तक लगातार चलती रहनी चाहिए.
श्रीसूक्त का तीसरा मंत्र
अश्व पूर्णां रथ मध्यां हस्तिनाद प्रमोदिनीं।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीजुषातम॥
शब्दार्थ – अश्वपूर्णां- सुनहरी परत, रथमध्यां- पानी के ऊपर,
हस्तिनाद- हाथी के गर्दन से निकलने वाली गंध, प्रमोदिनीं- नीबू का रस,
श्रियं- सोना, देवी- लक्ष्मी, पह्वये- समृद्धि, जुषातम- प्रसन्नता.
विधि – उपरोक्त विधि के अनुसार, तीन घंटे तक इन वस्तुओं
को ताम्रपात्र के पानी के ऊपर एक सुनहरी सी परत स्पष्ट दिखाई दे
तो अग्नि जलाने के साथ ही उस पात्र से हाथी के चिंघाड़ने
जैसी ध्वनि सुनाई देने लगेगी. साथ ही हाथी के गर्दन से निकलने
वाली विशेष गंध, उस पात्र से आने लगे तो समझना चाहिए कि पारा सिद्ध
हो चुका है, अर्थात सोना बन चुका है. सावधानी से उस पात्र को अग्नि से
उतारकर स्वभाविक रूप से ठंडा होने के लिए कुछ् समय छोड़ दें.
पानी ठंडा होने के पश्चात, उस पानी को धीरे धीरे निकाल दें. तत्पश्चात्,
उस पारे को निकालकर खरल में सावधानी से डालकर, ऊपर से नींबू का रस
डालकर खरल करना चाहिए. बार बार नींबू का रस डालिए और खरल में उस
पारे को रगड़ते जाइए, जब तक वह पारा सोने के रंग का न हो जाए.
विशेष सावधानी
· इस विधि को करने से पहले, इसे पूरी तरह समझ लेना आवश्यक है.
· इसे किसी योग्य वैद्याचार्य की देख रेख में ही करना चाहिए.
· इसके धुएँ में मौजूद गौस हानिकारक हैं, जिससे कई असाध्य रोग उत्पन्न
हो सकते हैं अतः, कर्ता को अत्यंत सावधान रहते हुए, उस जगह खड़े
या बैठे रहना चाहिए, जहाँ इससे निकलने वाला धुआँ, न आए.
ये एक उदाहरण हैं भारत के प्राचीन रसायन शाष्त्र का
भु गर्भ् मॆ पायॆ जानॆ वालॆ पॆट्रॊल् डिजल , सॊना , चान्दी , अल्युमिनियम यॆ
सब हजारॊ सालॊ भु गर्भ् मॆ दबॆ हॊनॆ का परिणाम्
है.जॊ प्रक्रिया हजारॊ हजारॊ सालॊ सॆ घटित हॊकर यॆ सब बनता है उस्
कॊ क्रत्रिम रुप सॆ भी बनाया जा सकता है. अगर आप संस्कृत कॆ जानकार
ह।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

भारतीय स्वर्णिम काल के अधोगति का कारण ब्राह्मण वर्ग में ब्राह्मणत्व का ह्रास तथा बौद्ध धर्म का अभ्युदय - अशोक "प्रवृद्ध"

भारतीय स्वर्णिम काल के अधोगति का कारन ब्राह्मण वर्ग में ब्राह्मणत्व का ह्रास तथा बौद्ध धर्म का अभ्युदय -अशोक "प्रवृद्ध"
भारतवर्ष में, जो कभी आर्यावर्त्त कहलाता था और जिसकी दुन्दुभि विश्व
में गूँजती थी, उसमें वैदिक काल से आरम्भ कर इसके अन्तिम स्वर्ण काल
तक अनेक काल आते गए। वे सब परिवर्तन के प्रतीक थे। समाज और समाज
के घटक मनुष्य, के जीवन में परिवर्तन प्रकृति का नियम है और यह
अवश्यम्भावी है। स्थिर जीवन अवगति का कारण बन जाता है। तब
प्रकृति ही उसे अवगति की ओर धकेलने के लिए बाध्य हो जाती है।
भारत के स्वर्णकाल के उपरान्त यह परिवर्तन ऐसी तीव्र गति से होने
लगा कि प्रकृति भी उसको रोक नहीं पाई और वह अधोगति की ओर अग्रसर
होने लगा। मानव प्राणी उससे त्रस्त होकर छटपटाने लगा था। यह
कलिकाल था। भारत के सभी प्रदेशों पर महाभारत युद्ध का दुष्परिणाम
अभी तक चला आ रहा था। युवा क्षत्रियों का व्यापक अभाव हो गया था।
अराजकता व्याप्त थी।
उस अराजकता में ब्राह्मण वर्ग अपनी आजीविका न चला सकने के कारण
पठन-पाठन, अध्ययन-अध्यापन का कार्य छोड़कर विभिन्न प्रकार के
व्यवसायों में प्रवृत्त हो गया था। उसी प्रक्रिया में उसने मन्दिर बनवाए,
उनमें विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ स्थापित कीं। कालान्तर में उन
मन्दिरों और मूर्तियों के भी अनेक रूप बन गए पूजा प्रकार और पद्धति में
व्यवापकता के नाम पर संकीर्णता समा गई, परिणाम-स्वरूप समाज में
विकृति व्याप गई। तब एक युग ऐसा भी आया जो मद्य, मांस और मुद्रा-
मैथुन का युग कहलाया।
इस परिवर्तन की प्रक्रिया में आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध
का जन्म हुआ। कहा जाता है कि बुद्ध ने सामाजिक विकृति से बचने
का उपाय खोजने का यत्न किया। तब एक नए सम्प्रदाय का प्रचलन
प्रारम्भ हुआ। कालान्तर में कदाचित् वह भी विकृत होने लगा और कुछ
सौ वर्षों के उपरान्त उन दोनों विकृत परम्पराओं में परस्पर संघर्ष होने
लगे। वे संघर्ष व्यक्ति और समाज तक ही सीमित न रहकर राज्यों में फैल
गए। दोनों प्रकार की विचारधाराएँ स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का यत्न
करने लगीं।
देवानाम्प्रिय अशोक के राज्यकाल में बौद्ध सम्प्रदाय भारत पर छा जाने के
लिए प्राणपण की बाजी लगाने लगा था। बुद्ध का तथाकथित
शान्ति अहिंसा सद्भावना का सन्देश किसी गहन में समा गया था। राज्य
दारोगा का कार्य करने लगा था।
यह लगभग कलि संवत् 1660 के काल की घटना है। पाटलिपुत्र के सिंहासन
पर अशोक विराजमान था। बौद्य धर्म की स्थापना के नाम पर वह भारतवर्ष
के विभिन्न राज्यों में एक प्रकार से सेंध लगा रहा था। कश्मीर में उस समय
महाराज जलौक का राज्य था। जलौक स्वयं शैव था किन्तु उसके राज्य में
सभी नागरिकों को सम्प्रदाय स्वन्त्रता प्राप्त थी। उसका ही यह परिणाम
था कि उसके राज्य में जहाँ एक ओर शैव मत अपनी दिशा में मन्थर गति से
चल रहा था वहाँ उसका एक अन्य सम्प्रदाय भैरव के नाम पर भैरवी चक्र में
चक्रायित हो रहा था। वैष्णवों के लिए भी उस राज्य में उतना ही स्थान था।
महाराज स्वयं शैव था।
अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए, कश्मीर से कन्याकुमारी तथा अटक
से कटक तक के राज्य के लिए महाराज अशोक ने अपना धर्मचक्र
चलाना आरम्भ किया तो सर्वप्रथम उसकी दृष्टि कश्मीर
की उर्वरा भूमि की ओर गई और उसको बौद्ध सम्पद्राय में सम्मिलित करने
के लिए बौद्ध भिक्षुओं को वहाँ भेजा। मार्तण्ड का सूर्य मन्दिर और
वहाँ का विशाल पुस्तकालय उस घुन के पहले शिकार बने। संयोगवश महाराज
जलौक को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने उसकी पुनर्प्रतिष्ठा की। किन्तु
अपने राज्य में फैलने वाले बौद्धमत को रोकने के लिए उनको बहुत प्रयत्न
करना पड़ा।
इस तथ्य से भारतवासी भलीभाँति परिचित हैं कि सर्वथा शान्तिप्रिय
अहिंसक मित्रता का व्यवहार करने वाला, जीवदया का प्रणेता होने पर
भी भारतवासियों ने बौद्ध सम्प्रदाय को सहर्ष स्वीकार नहीं किया। क्यों ?
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आज तक भी अनुत्तरित ही है।
विगत 2500 वर्षों में संसार में अनेक परिवर्तन हुए हैं। साम्राज्य ढहे,
साम्राज्य बने। प्राचीनता का लोप होता गया, नवीनता उसका स्थान
लेती गई। शान्ति और युद्ध का संघर्ष चलता रहा। किन्तु संसार ने बौद्ध
मत को स्वीकार नहीं किया। न केवल इतना, अपितु बौद्ध सम्प्रदाय
की उद्गम भूमि भारत में तो यह सर्वथा उखड़ ही गया है। विदेशों के बौद्ध
यात्री भले भी बौद्ध स्थलों की यात्रा के लिए इस देश में आते हों, किन्तु
इस देश के यात्रियों तथा पर्यटकों को उनमें ऐसी कोई रुचि नहीं दिखाई देती।
आज जब भारतीयों में पर्यटन प्रवृत्ति पनपने लगी है तो कोई- कोई इन
स्थलों पर पर्यटनों की दृष्टि से भले ही जाने की इच्छा करता हो, किन्तु
उन्हें अपने पूर्वजों की थाली समझकर, उनके प्रति श्रद्धा-भाव रखते हुए
जाने वालो की संख्या नगण्य ही है।