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गुरुवार, 2 जनवरी 2014

पुरातन गौरवमयी वैदिक संस्कृति की गंगा बन्द न हो

पुरातन गौरवमयी वैदिक संस्कृति की गंगा बन्द न हो

ओ3म् अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम।
सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो अग्निः।। यजुर्वे 7.14।।

अर्थ- (देव) हे दिव्य शक्तियों के भण्डार (सोम) सब प्रकार के ऐश्वर्य और शान्ति के निधि प्रभो!  हम (अच्छिन्नस्य) निरन्तर अबाध होकर बहने वाले (ते) तेरे (सुवीर्यस्य) सुवीर्य और (रायस्पोषस्य) ऐश्वर्य और उससे प्राप्त होने वाली पुष्टि के (ददितारः) देने वाले (स्याम) बनें। वह सुवीर्य और रायस्पोष कौन-सा है अथवा कहॉं से आता है ? कहते हैं (विश्ववारा) सबके वरण करने योग्य (सा) वह (प्रथमा) सबसे पहली (संस्कृतिः) वैदिक संस्कृति है। इस संस्कृति का उद्‌गम स्थान कौन है ? कहते हैं (सः) वह (प्रथमः) सबसे पहला (वरुणः) वरण करने योग्य अथवा पाप से बचाने वाला (अग्निः) सबको गर्मी और प्रकाश देकर आगे ले जाने वाला (मित्रः) सबका हित चाहने वाला मित्र तू ही है।

भगवान् वरुण हैं। वे सबके वरण करने योग्य हैं। उनकी प्राप्ति से बढ़कर कोई और चीज मनुष्य के लिये हितकारी नहीं हो सकती। मनुष्य सारी उन्नति और तरक्की इसीलिए करता है कि वह सुखी होना चाहता है। पर उसकी यह पूर्ण सुखी होने की हार्दिक इच्छा जगत्‌ में पूरी नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी ही आश्चर्यजनक सांसारिक उन्नति कर ले। इस सांसारिक उन्नति से उसके सुख की मात्रा थोड़ी-बहुत बढ़ सकती है, पर पूर्ण आनन्दवान् होने की उसकी इच्छा यहॉं पूरी नहीं हो सकती। कोई भी सांसारिक जीवनचर्या का गम्भीर निरीक्षण करने वाला इस सच्चाई का अनुभव कर सकता है। पूर्ण सुखी होने की मनुष्य की इच्छा प्रभु को प्राप्त करने पर ही पूरी हो सकती है। क्योंकि एकमात्र प्रभु ही पूर्ण सुखी हैं, आनन्दस्वरूप हैं। इसलिये प्रभु ही सबके सबसे अधिक वरणीय हैं। वह प्रभु पाप के निवारण करने वाले भी हैं। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों के कल्याण के लिये दिये गये अपने ज्ञान-राशि वेद के द्वारा वे मनुष्य के आगे पाप से बचने के लिये धर्म का स्वरूप खोलकर रख देते हैं। जो प्रभु के साथ अपना गाढ़ा सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, उनके हृदयों में पाप मार्ग से बचने के लिये प्रेरणा भी प्रभु करते रहते हैं। जो पाप-मार्ग को छोड़कर धर्म- मार्ग पर चलते हैं, उन्हें एक न एक दिन आनन्द-धाम प्रभु का साक्षात् हो ही जाता है।

प्रभु अग्नि हैं। वे गरमी और रोशनी को देकर  सबके जीवनों को उन्नति के मार्ग में आगे ले जाते हैं। धर्म के मार्ग में उन्नति करने के लिये गरमी और रोशनी की जरूरत है। अज्ञानी और ठण्डा पड़ गया मनुष्य उन्नति नहीं कर सकता। धर्म के मार्ग में तो और भी नहीं कर सकता। प्रभु हमें ज्ञान का प्रकाश देने वाले हैं। वेद द्वारा और प्रभु के लिये आत्मार्पण कर चुके हृदयों में प्रेरणा द्वारा प्रभु का प्रकाश मिलता है। बल भी हमें प्रभु की कृपा से ही मिलता है। इसे कोई भी संसार का और अपना गम्भीर निरीक्षण करने वाला आसानी से समझ सकता है। परन्तु प्रभु के लिये आत्मार्पण कर देने वाले भक्तों के हृदयों में जो बल का अथाह और असीम समुद्र हिलोरें लेने लगता है, वह किसी भी पहुँचे हुए प्रभुभक्त के जीवन में स्पष्ट देखा जा सकता है। इन लोगों में युगान्तर उपस्थित कर देने की शक्ति पैदा हो जाती है। प्रभु सचमुच में अग्नि हैं।

साथ ही वह प्रभु मित्र भी हैं। प्रभु की वरणीयता और अग्निरूपता हमारे लिये किस काम की, यदि वे हमारे लिये न हों। पर प्रभु तो हमारे मित्र हैं, हमारा परम हित चाहने वाले हैं। उनका सब कुछ हमारे हित और कल्याण के लिये है। वे हमारे मित्र होकर खुले हाथों अपनी वरणीयता और अग्निरूपता लुटा रहे हैं। जो चाहे लेकर अपने को निहाल कर लें।

पर हमें तो प्रभु की वरणीयता और अग्निरूपता कहीं लुटती नजर नहीं आती, कहॉं जाकर उसे लें? कहा कि संसार के आरम्भ में मनुष्य मात्र का ही नहीं, अपितु प्राणिमात्र का कल्याण करने के लिये प्रभु ने जो वैदिक संस्कृति दी थी उसका अध्ययन करो, मनन करो और उसे समझो तथा फिर करो उसके अनुसार अपना आचरण। फिर देखो क्या होता है! तुम्हें प्रभु की वरुणरूपता भी समझ में आ जायेगी और अग्निरूपता भी। तुम्हारे पास न बल और पराक्रम की कमी रहेगी,न धन-दौलत की। बल और पराक्रम कैसा? सुवीर्य। उससे किसी का अनिष्ट और बिगाड़ नहीं होना चाहिए। उसका उपयोग सबकी भलाई और कल्याण में होना चाहिये। फिर धन-दौलत कैसी ? जिससे तुम्हें पुष्टि भी मिलती हो। वह खाली "रै' न होकर रायस्पोष हो, पुष्टि देने वाली हो। फिर इस सबके स्वीकार करने योग्य संस्कृति के अध्ययन, मनन और तदनुकूल आचरण से खाली इस दुनिया की धन-दौलत ही नहीं मिलेगी, तुम सबसे कीमती, सबसे प्यारी, सबसे स्थायी दौलत के अधिकारी हो जाओगे। तुम पूर्ण सुख के धाम आनन्दस्वरूप भगवान्न के प्रत्यक्ष साक्षात्कार के अधिकारी हो जाओगे, जिसके सम्बन्ध में स्वयं वेद ने कहा है- "रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः'। (अथर्ववेद 10.8.44) वह रस से तृप्त है, उसमें रस की कहीं कुछ कमी नहीं है।

वैदिक-संस्कृति का अनुशीलन करने वाले और उसके फलस्वरूप अपने को आनन्द धाम प्रभु के साक्षात्कार के योग्य बना लेने वाले भक्त! उस बल-पराक्रम और रायस्पोष को प्राप्त करके ही सन्तुष्ट न हो जाना, यहीं न ठहर जाना। उस बल-पराक्रम और रायस्पोष की धारा को औरों के लिए भी बहाते रहना और ऐसा प्रबन्ध कर जाना कि यह धारा तुम्हारे पीछे भी, तुम्हारी सन्तति के द्वारा भी निरन्तर अबाधित रूप में अच्छिन्न होकर बहती रहे। वेद के शब्दों में तुमने प्रभु से "अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम' यह और प्रतिज्ञा की है। इसे कार्यरूप में लाते रहना। वैदिक संस्कृति की धारा सदा बहाते रहना तेरा कर्त्तव्य है। तेरे द्वारा अपने इस कर्त्तव्य के पालन से ही संसार में शान्ति की धारा बह सकेगी।

भगवान् सोम हैं, शान्ति के समुद्र हैं। मनुष्यों को परम शान्ति तथा परम आनन्द की गङ्गा में स्नान कराते रहने की भावना से ही प्रभु ने सृष्टि के आरम्भ में वेद की संस्कृति का, मांजकर पवित्र कर देने वाली वेद की शिक्षा का उपदेश दिया था। "सोम' प्रभु से मिलने वाली संस्कृति ही संसार में वास्तविक शान्ति ला सकती है।

रविवार, 28 जुलाई 2013

पुरातन ग्रंथों में सापेक्षता का सिद्धांत -अशोक "प्रवृद्ध"

पुरातन ग्रंथों में सापेक्षता के सिद्धांत
  अशोक "प्रवृद्ध"
आइंस्टीन ने अपने सापेक्षता के सिद्धांत में दिक् व काल
की सापेक्षता प्रतिपादित की। उसने कहा, विभिन्न ग्रहों पर समय
की अवधारणा भिन्न-भिन्न होती है। काल का सम्बन्ध ग्रहों की गति से
रहता है। इस प्रकार अलग-अलग ग्रहों पर समय का माप भिन्न रहता है।
समय छोटा-बड़ा रहता है।
उदाहरण के लिए यदि दो जुडुवां भाइयों मे से एक को पृथ्वी पर ही रखा जाये
तथा दुसरे को किसी अन्य गृह पर भेज दिया जाये और कुछ वर्षों पश्चात
लाया जाये तो दोनों भाइयों की आयु में अंतर होगा।
आयु का अंतर इस बात पर निर्भर करेगा कि बालक को जिस गृह पर
भेजा गया उस गृह की सूर्य से दुरी तथा गति , पृथ्वी की सूर्य से
दुरी तथा गति से कितनी अधिक अथवा कम है ।
एक और उदाहरण के अनुसार चलती रेलगाड़ी में रखी घडी उसी रेल में बैठे
व्यक्ति के लिए सामान रूप से चलती है क्योकि दोनों रेल के साथ एक
ही गति से गतिमान है परन्तु वही घडी रेल से बाहर खड़े व्यक्ति के लिए धीमे
चल रही होगी । कुछ सेकंडों को अंतर होगा । यदि रेल की गति और बढाई
जाये तो समय का अंतर बढेगा और यदि रेल को प्रकाश
की गति (299792.458 किमी प्रति सेकंड) से दोड़ाया जाये (जोकि संभव
नही) तो रेल से बाहर खड़े व्यक्ति के लिए घडी पूर्णतया रुक जाएगी ।
सापेक्षता का सिद्धांत पुरातन ग्रंथों के पोराणिक कथाओं में
इसकी जानकारी के संकेत हमारे ग्रंथों में मिलते हैं। श्रीमद भागवत पुराण में
कथा आती है कि रैवतक राजा की पुत्री रेवती बहुत लम्बी थी, अत: उसके
अनुकूल वर नहीं मिलता था। इसके समाधान हेतु राजा योग बल से
अपनी पुत्री को लेकर ब्राहृलोक गये। वे जब वहां पहुंचे तब वहां गंधर्वगान
चल रहा था। अत: वे कुछ क्षण रुके। जब गान पूरा हुआ तो ब्रह्मा ने
राजा को देखा और पूछा कैसे आना हुआ? राजा ने कहा मेरी पुत्री के लिए
किसी वर को आपने पैदा किया है या नहीं? ब्रह्मा जोर से हंसे और कहा,
जितनी देर तुमने यहां गान सुना, उतने समय में पृथ्वी पर 27 चर्तुयुगी {1
चर्तुयुगी = 4 युग (सत्य,द्वापर,त्रेता,कलि ) = 1 महायुग } बीत चुकी हैं
और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है। तुम वहां जाओ और कृष्ण के भाई
बलराम से इसका विवाह कर देना।
अब पृथ्वी लोक पर तुम्हे तुम्हारे सगे सम्बन्धी, तुम्हारा राजपाट
तथा वैसी भोगोलिक स्थतियां भी नही मिलेंगी जो तुम छोड़ कर आये हो |
साथ ही उन्होंने कहा कि यह अच्छा हुआ कि रेवती को तुम अपने साथ लेकर
आये। इस कारण इसकी आयु नहीं बढ़ी। अन्यथा लौटने के पश्चात तुम इसे
भी जीवित नही पाते |
अब यदि एक घड़ी भी देर कि तो सीधे कलयुग (द्वापर के पश्चात कलयुग )
में जा गिरोगे |
इससे यह भी स्पष्ट है की निश्चय ही ब्रह्मलोक कदाचित
हमारी आकाशगंगा से भी कहीं अधिक दूर है । मेरे मतानुसार यह स्थान
ब्रह्माण्ड का केंद्र होना चाहिए ।
इसी कारण वहां का एक मिनट भी पृथ्वी लोक के खरबों वर्षों के समान है |
यह कथा पृथ्वी से ब्राहृलोक तक विशिष्ट गति से जाने पर समय के अंतर
को बताती है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी कहा कि यदि एक व्यक्ति प्रकाश
की गति से कुछ कम गति से चलने वाले यान में बैठकर जाए तो उसके शरीर
के अंदर परिवर्तन की प्रक्रिया प्राय: स्तब्ध हो जायेगी। यदि एक दस वर्ष
का व्यक्ति ऐसे यान में बैठकर देवयानी आकाशगंगा (Andromeida
Galaz) की ओर जाकर वापस आये तो उसकी उमर में केवल 56 वर्ष बढ़ेंगे
किन्तु उस अवधि में पृथ्वी पर 40 लाख वर्ष बीत गये होंगे।
काल के मापन की सूक्ष्मतम और महत्तम इकाई के वर्णन को पढ़कर
दुनिया का प्रसिद्ध ब्राह्माण्ड विज्ञानी कार्ल सगन (Carl Sagan)
अपनी पुस्तक कॉसमॉस (Cosmos )में लिखता है, "विश्व में एक मात्र
हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म है, जो इस विश्वास को समर्पित है कि ब्राह्माण्ड
सृजन और विनाश का चक्र सतत चल रहा है। तथा यही एक धर्म है जिसमें
काल के सूक्ष्मतम नाप परमाणु से लेकर दीर्घतम माप ब्राह्म दिन और रात
की गणना की गई, जो 8 अरब 64 करोड़ वर्ष तक बैठती है
तथा जो आश्चर्यजनक रूप से हमारी आधुनिक गणनाओं से मेल खाती है।"
योगवासिष्ठ आदि ग्रंथों में योग साधना से समय में पीछे जाना और
पूर्वजन्मों का अनुभव तथा भविष्य में जाने के अनेक वर्णन मिलते हैं।

पुरातन ग्रंथों में सोना बनाने की विधि - अशोक "प्रवृद्ध"

पुरातन ग्रंथों में सोना बनाने की विधि
   अशोक "प्रवृद्ध"
प्राचीनकाल में रसायनज्ञ पारद या पारे से सोना बनाने की विधि जानते
थे.यह बात आज कपोल कल्प्ना या मिथ सरीखी लगती है जबकी इसके कई
प्रमाण मौज़ूद हैं.सच्चाई यह है कि य प्रकिया बेहद कठिन और अनुभव
सिद्ध है.तमाम कीमियाग़र सोना बनाने में नाकामयाब रहे, कुछ थोडे से
जो सफल रहे उन्होने इस विद्या को गलत हाथों में पडने के डर से इसे बेहद
गोपनीय रखा.
राक्षस दैत्य दानवों के गुरू भृगु ऋषि जिन्हें शुक्राचार्य के नाम से
भी संबोधित किया जाता है, उन्होंने ऋग्वेदीय उपनिषद श्रीसूक्त के माध्यम
से सोना बनाने का तरीका बताया है. श्रीसूक्त के मंत्र व प्रयोग बहुत गुप्त
व सांकेतिक भाषा में बताया गया है. संपूर्ण श्रीसूक्त में 16 मंत्र हैं.
भारत के नागार्जुन, गोरक्षनाथ आदि ने इन मत्रों की रसायनिक दृष्टि से
सोना बनाने की कई विचित्र विधियाँ, कई स्थानों और कई ग्रंथों में बताई
गयी हैं. अर्थात, श्रीसूक्त के पहले तीन मंत्रों में सोना बनाने की विधि,
रसायनिक व्याख्या और उनका गुप्त भावार्थ, आपके समक्ष प्रस्तुत
किया जा रहा है.
श्रीसूक्त का पहला मंत्र
ॐ हिरण्य्वर्णां हरिणीं सुवर्णस्त्र्जां।
चंद्रां हिरण्यमणीं लक्ष्मीं जातवेदो मआव॥
शब्दार्थ – हिरण्य्वर्णां- कूटज, हरिणीं- मजीठ, स्त्रजाम- सत्यानाशी के
बीज, चंद्रा- नीला थोथा, हिरण्यमणीं- गंधक, जातवेदो- पाराम, आवह-
ताम्रपात्र.
विधि – सोना बनाने के लिए एक बड़ा ताम्रपात्र लें, जिसमें लगभग 30
किलो पानी आ सके. सर्वप्रथम, उस पात्र में पारा रखें. तदुपरांत, पारे के
ऊपर बारीक पिसा हुआ गंधक इतना डालें कि वह पारा पूर्ण रूप से ढँक जाए.
उसके बाद, बारीक पिसा हुआ नीला थोथा, पारे और गंधक के ऊपर धीरे धीरे
डाल दें. उसके ऊपर कूटज और मजीठ बराबर मात्रा में बारीक करके पारे,
गंधक और नीले थोथे के ऊपर धीरे धीरे डाल दें और इन सब वस्तुओं के
ऊपर 200 ग्राम सत्यानाशी के बीज डाल दें. यह सोना बनाने
का पहला चरण है
श्रीसूक्त का दूसरा मंत्र
तां मआवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं।
यस्या हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहं॥
शब्दार्थ – तां- उसमें, पगामिनीं- अग्नि, गामश्वं- जल, पुरुषानहं- बीस.
विधि – ऊपर बताए गए ताँबे के पात्र में पारा, गंधक, सत्यानाशी के बीज
आदि एकत्र करने के उपरांत, उस ताम्रपात्र में अत्यंत सावधानीपूर्वक जल
इस तरह भरें कि जिन वस्तुओं की ढेरी पहले बनी हुई है, वह तनिक भी न
हिले. तदनंतर, उस पात्र के नीचे आग जला दें. उस पात्र के पानी में, हर
एक घंटे के बाद, 100 ग्राम के लगभग, पिसा हुआ कूटज, पानी के ऊपर
डालते रहना चाहिए. यह विधि 3 घंटे तक लगातार चलती रहनी चाहिए.
श्रीसूक्त का तीसरा मंत्र
अश्व पूर्णां रथ मध्यां हस्तिनाद प्रमोदिनीं।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीजुषातम॥
शब्दार्थ – अश्वपूर्णां- सुनहरी परत, रथमध्यां- पानी के ऊपर,
हस्तिनाद- हाथी के गर्दन से निकलने वाली गंध, प्रमोदिनीं- नीबू का रस,
श्रियं- सोना, देवी- लक्ष्मी, पह्वये- समृद्धि, जुषातम- प्रसन्नता.
विधि – उपरोक्त विधि के अनुसार, तीन घंटे तक इन वस्तुओं
को ताम्रपात्र के पानी के ऊपर एक सुनहरी सी परत स्पष्ट दिखाई दे
तो अग्नि जलाने के साथ ही उस पात्र से हाथी के चिंघाड़ने
जैसी ध्वनि सुनाई देने लगेगी. साथ ही हाथी के गर्दन से निकलने
वाली विशेष गंध, उस पात्र से आने लगे तो समझना चाहिए कि पारा सिद्ध
हो चुका है, अर्थात सोना बन चुका है. सावधानी से उस पात्र को अग्नि से
उतारकर स्वभाविक रूप से ठंडा होने के लिए कुछ् समय छोड़ दें.
पानी ठंडा होने के पश्चात, उस पानी को धीरे धीरे निकाल दें. तत्पश्चात्,
उस पारे को निकालकर खरल में सावधानी से डालकर, ऊपर से नींबू का रस
डालकर खरल करना चाहिए. बार बार नींबू का रस डालिए और खरल में उस
पारे को रगड़ते जाइए, जब तक वह पारा सोने के रंग का न हो जाए.
विशेष सावधानी
· इस विधि को करने से पहले, इसे पूरी तरह समझ लेना आवश्यक है.
· इसे किसी योग्य वैद्याचार्य की देख रेख में ही करना चाहिए.
· इसके धुएँ में मौजूद गौस हानिकारक हैं, जिससे कई असाध्य रोग उत्पन्न
हो सकते हैं अतः, कर्ता को अत्यंत सावधान रहते हुए, उस जगह खड़े
या बैठे रहना चाहिए, जहाँ इससे निकलने वाला धुआँ, न आए.
ये एक उदाहरण हैं भारत के प्राचीन रसायन शाष्त्र का
भु गर्भ् मॆ पायॆ जानॆ वालॆ पॆट्रॊल् डिजल , सॊना , चान्दी , अल्युमिनियम यॆ
सब हजारॊ सालॊ भु गर्भ् मॆ दबॆ हॊनॆ का परिणाम्
है.जॊ प्रक्रिया हजारॊ हजारॊ सालॊ सॆ घटित हॊकर यॆ सब बनता है उस्
कॊ क्रत्रिम रुप सॆ भी बनाया जा सकता है. अगर आप संस्कृत कॆ जानकार
ह।